Vijayanagar Empire (1336-1652) – विजयनगर साम्राज्य का इतिहास



विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) – 1325 ई. मुहम्मद बिन तुगलक के चचेर भाई बहाउद्दीन गुर्शस्प ने कर्नाटक में सागर नामक स्थान पर विद्रोह कर दिया। सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक इस विद्रोह को दबाने के लिए स्वयं दक्षिण आया। बहाउद्दीन भाग कर कर्नाटक में स्थित कंपिली के राजा के पास शरण लिये । मोहम्मद बिन तुगलक ने कंपिली को विजित कर उसे दिल्ली सल्तनत में मिला लिया। कंपिली विजय के दौरान ही मुहम्मद तुगलक ने उस राज्य के अधिकारियों में हरिहर व बुक्का नामक दो भाईयों को बंदी बना लिया तथा उन्हें दिल्ली ले आया। बंदी बनाए जाने के बाद हरिहर व बुक्का ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था।

मुहम्मद बिन तुगलक ने हरिहर व बुक्का को मुक्त कर दक्षिण भेजा। दोनों भाईयों ने विद्रोह का दमन किया। इसी समय वे विद्यारण्य नामक एक संत के प्रभाव में आए। विद्यारण्य ने हरिहर व बुक्का को अपने गुरु और शृंगेरी के मठाधीश विद्यातीर्थ की अनुमति से पुनः हिन्दू धर्म में दीक्षित किया।

हिन्दू धर्म को पुनः अंगीकार करने के बाद 1336 ई. में हरिहर ने हम्पी हस्तिनावती राज्य की नींव रखी थी। उसी वर्ष उसने तुगभद्रा के दक्षिणी तट पर स्थित अनेगोण्डी के निकट विजयनगर (विद्यानगर) शहर की स्थापना हुई ।

विजयनगर व बहमनी साम्राज्य के मध्य संघर्ष का केन्द्र कृष्णा व तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित प्रसिद्ध रायचूर दोआब था।

विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) के 4 राजवंश

I. संगम वंश (1336-1485 ई.)

संगम वंश विजयनगर साम्राज्य के 4 राजवंशों में प्रथम था। हरिहर व बुक्का संगम के पुत्र थे। इन्होंने अपने पिता संगम के नाम पर इस वंश का नाम संगम वंश रखा ।

संगम वंश में 10 शासक हुए। हरिहर प्रथम संगम वंश का प्रथम तथा विरुपाक्ष द्वितीय (1465-86 ई.) अन्तिम शासक था।

1. हरिहर-I (1336-1356 ई.)

हरिहर-I संगम वंश का प्रथम शासक था। इसकी पहली राजधानी अनेगोण्डी थी जो तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित थी। पहाड़ी पर स्थित होने के बाद भी यह सुरक्षित नहीं था। इसलिए बाद में उसने विजयनगर को अपनी दूसरी राजधानी बनाया ।

विजयनगर के ध्वंसावशेष हम्पी में विद्यमान हैं। गद्दी पर बैठने के उपरान्त हरिहर प्रथम ने अपने भाई बुक्का की सहायता से साम्राज्य विस्तार का कार्य प्रारम्भ किया तथा विजयनगर साम्राज्य को उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर दक्षिण में कावेरी नदी तक विस्तृत किया। पड़ोसी राज्यों में वारंगल का संस्थापक कायप नायक, उसका मित्र प्रोलय वेम व वीर वल्लाल-III उसके विरुद्ध थे।

देवगिरी का सुबेदार कुतलुग खां भी हरिहर का विरोधी था। 1342 ई. में वीर वल्लाल-III की मदुरा के सुलतान गयासुद्दीन दमगान शाह ने धोखे से हत्या कर दी।

इसके बाद उसका पुत्र वीर वल्लाल-IV शासक बना जो अयोग्य सिद्ध हुआ। उसकी अयोग्यता का लाभ हरिहर ने होयसल राज्य को अपने राज्य में मिला लिया। तत्पश्चात् 1347 ई. में उसने कादम्ब प्रदेश को भी विजयनगर में शामिल किया। हरिहर-I के समय में बहमनी व विजयनगर के मध्य संघर्ष प्रारम्भ हुआ।

बहमनी वंश के संस्थापक अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ने कृष्णा व तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित रायचूर के किले पर अधिकार कर लिया। यह बहमनी व विजयनगर के मध्य संघर्ष का प्रारंभ था जो लगभग 200 वर्षों तक चलता रहा।

हरिहर-I ने प्रशासनिक व्यवस्था में भी सुधार का प्रयास किया। उसने काकतीय राजव्यवस्था का अनुकरण कर अपने राज्य को देश, स्थल तथा नाड्डुओं में विभाजित किया।

शासन में कार्यों के लिए करणमों के रूप में ब्राह्मणों की नियुक्ति की थी। उसने राज्य में कृषि के विकास के लिए भी कार्य किया। 1336 ई. में हरिहर-I की मृत्यु हो गयी।

Vijayanagar Empire
विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire)

विजयनगर

(Vijayanagar Empire)

स्थापना: 1336 ई.

संस्थापक: हरिहर व बुक्का

राजधानी: अनगोण्डी, विजयनगर, पेनुकोण्डा तथा चन्द्रगिरि, हम्पी (हरितनावती) विजयनगर की पुरानी राजधानी थी।

विजयनगर का वर्तमान नाम हम्पी (हस्तिनावती) है।

राष्ट्रीय सिक्का: वराह (स्वर्ण सिक्का)

धर्मः शैवधर्म (कृष्णदेव राय का धर्म वैष्णव)

राज भाषा: तेलुगू

2. बुक्का-I (1356-77 ई.)

हरिहर के बाद उसका भाई बुक्का – I शासक बना। वह एक महान योद्धा राजनीतिज्ञ व विद्या प्रेमी था। अभिलेखों से उसे पूर्वी, पश्चिमी, व दक्षिणी के सागरों का स्वामी कहा गया है। उसने विजयनगर के निर्माण कार्य को पूरा करवाया तथा शासन का केन्द्रीयकरण किया।

बुक्का-I का एक महान विजय मदरा विजय थी जिसके कारण उसका राज्य सुदूर दक्षिण में रामेश्वर तक पहुंच गया। मदुरा विजय हेतु बुक्का ने अपने पुत्र परकंपन को भेजा था।

मदुरा को विजित करने के बाद कुक्का ने अपने पुत्र कम्पन को इस नवविजित तमिल प्रदेशों पर विजयनगर का वाइसराय नियुक्त किया। कुमार कंपन की पत्नी गंगा देवी ने अपने पति द्वारा मदुरा विजय का अपने ग्रन्थ ‘मदुरा विजयम’ में | बड़ा सजीव वर्णन किया है।

धार्मिक दृष्टि से उसने हिन्दू धर्म की सुरक्षा का दावा किया तथा ‘वेदमार्ग प्रतिष्ठापक’ की उपाधि धारण किया। इसके अतिरिक्त अन्य धर्मों के प्रति भी उसने सहिष्णुता की नीति का पालन किया। उसने जैनियों व वैष्णवों के मध्य समन्वय स्थापित किया तथा वेद व अन्य धार्मिक ग्रन्थों की नवीन टीकाएं लिखवाई। उसने तेलगू साहित्य को प्रोत्साहन दिया।

बुक्का-I ने वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार सायणाचार्य को आश्रय दिया। 1377 ई. में बुक्का की मृत्यु हो गयी।

3. हरिहर-II (1377-1404 ई.)

बुक्का-I के मृत्यु के बाद हरिहर-II गद्दी पर बैठा। वह विजयनगर साम्राज्य का प्रथम शासक था जिसने राजाधिराज और राजपरमेश्वर की उपाधि धारण की। हरिहर-II के समय में विजयनगर का अन्य दिशाओं में विस्तार हुआ।

संपूर्ण सुदूर दक्षिण भारत पर विजयनगर साम्राज्य का विस्तार करने का श्रेय हरिहर-II को दिया जा सकता है। हरिहर-II विरुपाक्ष का उपासक था किन्तु शैव, वैष्णव व जैनियों को भी समान रूप से संरक्षण दिया।

विद्वता और विद्वानों को प्रदत्त संरक्षण के कारण उसे राजव्यास (राजवाल्मीकी) की उपाधि प्राप्त थी। वेदों के प्रसिद्ध टीकाकार सायणायाचार्य उसका मुख्यमंत्री था। उसके एक अभिलेख में माधव विद्यारण्य को सर्वोच्च प्रकाश का अवतार’ कहा गया है।

जैन धर्म का अनुयायी तथा नानार्थ रत्नमाला का लेखक ईरूगापा उसका सेनापति था। 1404 ई. में हरिहर-II की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में सत्ता के लिए संघर्ष प्रारम्भ हो गया अन्त में देवराय-I शासक बना।

4. देवराय-I (1406-22 ई.)

हरिहर-II के बाद अगला शासक देवराय-I था। राज्यारोहण के तुरंत बाद, देवराय-I को बहमनियों के उग्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्होंने कोंडविडु के रेडियों, वारंगल के वेलमाओं व उड़ीसा के गजपति नरेशों के साथ सैनिक गठबन्धन कर लिया था।

बहमनी शासक फिरोजशाह ने विजयनगर पर आक्रमण किया जिसमें देवराय-I पराजित हुआ। अन्त में दोनों के मध्य एक संधि हुई जिसके अनुसार देवराय-I ने अपनी पुत्री का विवाह फिरोजशाह के साथ किया तथा बांकापुर दहेज में दिया। उसने तंगभद्रा नदी पर बांध बनाकर विजयनगर के लिए नहरें निकाली जिससे कृषि का अत्यधिक विकास हुआ।

देवराय-I ने सिंचाई के लिए हरिहर नदी पर बांध बनाने की योजना को भी प्रोत्साहन दिया। देवराय-I के शासन काल में इटली यात्री निकोलो कान्टी ने 1430 ई. में विजयनगर की यात्रा की थी। उसने हरविलास नामक ग्रन्थ चूर्ण रचनाकार व प्रसिद्ध तेलुगु कवि श्रीनाथ को संरक्षण प्रदान किया था। सम्राट अपने राजप्रासाद के मुक्त सत्रागार में विद्वानों को सम्मानित किया।

5. रामचन्द्र (6 महीने)

1422 ई. में देवराय-I की मृत्यु हो गयी। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र रामचन्द्र इसका उत्तराधिकारी हुआ। किन्तु वह मात्र 6 माह तक शासन किया।

6. विजय-I (6 महीने)

विजय-I शासक बना जो विजयभूपति, विजय बुक्का या वीर बुक्का-III के रूप में प्रसिद्ध हुआ। सम्भवतः इसने भी मात्र 6 महीने तक शासन किया। इसके बाद देवराय द्वितीय शासन बना।

7. देवराय-II (1422-46 ई.)

गजवेटकर (हाथियों का शिकारी), इन्मादि देव राय (प्रौढ़ देवराय) प्रमुख सामान्य जन देवराय द्वितीय को हिन्दू पौराणिक आख्यानों के दैवी शासक इन्द्र का अवतार मानते थे ।

देवराय – II संगम वंश का महानतम शासक था। उसका साम्राज्य विस्तार श्रीलंका (सीलोन) के तट तक विस्तृत हो गया था। अपनी सैनिक शक्ति मजबूत करने के लिए देवराय-II ने 2000 तुर्की धनुर्धरों को अपनी सेना में भर्ती किया तथा उन्हें जागीरें दी।

देवराय-II के समय में फारस (ईरान) का राजदूत अबदुर्रज्जाक ने विजयनगर की यात्रा की थी। अबुदर्रज्जाक इरान के शासक मिर्जा शाहरुख के दूत के रूप में भारत आया था। अपने लिंगायत धर्मावलम्बी मंत्री लक्कना (लख्मख) को दक्षिणी सागर का स्वामी नियुक्त किया।

जब तेलगू के प्रसिद्ध कवि श्रीनाथ ने उसके दरबारी कवि दिनदिमा को एक शास्त्रार्थ में पराजित कर दिया तो देवराय-II ने उसे ‘कवि सार्वभौम’ की उपाधि से सम्मानित किया और उस पर सोने के सिक्कों की (कनकाभिषेक सम्मान) बौछार की थी।

8. मल्लिकार्जुन (1446-65 ई.)

उपाधिः इम्मादि देवराय, प्रौढ़ देवराय तथा गजवेटकर

मलिकार्जुन ने भी अपने पिता देवराय-I की भांति ‘गजवेटकर’ की उपाधि धारण की थी। माल्लिकार्जुन राज्यारोहण के समय अल्पायु था। स्थिति का लाभ उठाकर बहमनी शासक अलाउद्दीन-I तथा उड़ीसा के गजपति शासक कपिलेश्वर ने संयुक्त रूप से विजयनगर पर आक्रमण किए किन्तु मल्लिकार्जुन ने उनके इस अभियान को विफल कर दिया।

अंत में गजपतियों ने उसके कोण्डवीर और उदयगिरि नामक दो महत्वपूर्ण किलों को छीनने में सफल रहे। मल्लिकार्जुन के शासन काल में माहुयान नामक चीनी यात्री ने समुद्री यात्रा कर विजयनगर आया था। 1465 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसका उत्तराधिकारी विरुपाक्ष-II था।

9. विरुपाक्ष-II (1465-85 ई.)

विरुपाक्ष-II संगम वंश का अन्तिम शासक था। इसके शासनकाल में आंतरिक विघटन व वाह्य आक्रमण के फलस्वरूप संगम वंश का पतन आरंभ हो गया। बहमनी वजीर महमूद गवां तथा उड़ीसा के गजपति नरेश कपिलेश्वर ने विजयनगर पर आक्रमण किए जिसमें बहमनी साम्राज्य ने गोवा, दाबुल और चौल तथा गजपतियों ने उदयगिरि व विजयनगर साम्राज्य के आन्ध्र प्रदेशों पर अधिकार कर लिए।

बहमनी साम्राज्य द्वारा विजयनगर की यह प्रथम पराजय थी। इसके बाद 1485 ई. में विरुपाक्ष के पुत्र ने उसकी हत्या कर दी।

10. प्रौढ़ देवराय (1485 ई.)

विरुपाक्ष की हत्या के बाद कुछ समय तक प्रौढ़ देवराय गद्दी पर बैठा। यह | घटना प्रथम बलापहार कहलाती है। प्रौढ़ देवराय के गद्दी पर बैठते ही राज्य में अराजकता व्याप्त हो गयी जिसका उल्लेख पुर्तगाली यात्री नूनीज ने भी किया है।

विजयनगर साम्राज्य में व्याप्त इस अराजकतापूर्ण स्थिति को देखकर चन्द्रगिरि के गवर्नर सालुक नरसिंह ने राजसिंहासन पर अधिकार कर लिया तथा एक नए वंश की स्थापना हुई।

II. सालुव वंश (1485-1505 ई.)

सालुव नरसिंह (1485-1490 ई.)

विजयनगर साम्राज्य के राजसिंहासन को प्रथम बार बलपूर्वक प्राप्त के बाद सालुव वंश की स्थापना हुई। यह विजयनगर का दूसरा राजवंश था जिसका संस्थापक सालुव नरसिंह था।

सत्ता प्राप्त करने के पश्चात् सर्वप्रथम इसने विजयनगर के सामंत शासकों व विद्रोही नायकों के विद्रोहों का दमन किया। तत्पश्चात् विदेशी आक्रमणों का मुकाबला किया।

सालुव नरसिंह के समय में उड़ीसा के पुरुषोत्तम गजपति ने विजयनगर पर आक्रमण किया तथा उसे पराजित कर बंदी बना दिया। किंतु सालुव नरसिंह द्वारा अपनी मुक्ति की याचना करने पर उसे मुक्त कर दिया, पर उदयगिरि का प्रदेश गजपतियों के अधिकार में चला गया।

अपनी इस पराजय से सालुव नरसिंह हतोत्साहित नहीं हुआ। सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने अरब व्यापारियों से अधिक से अधिक घोड़े आयात करने के लिए उन्हें प्रलोभन व प्रोत्साहन दिया। उसने कर्नाटक के तुलव प्रदेश पर विजयनगर की सत्ता स्थापित हुई। 1490 ई. में सालुव नरसिंह की मृत्यु हो गयी।

सालुव नरसिंह के दो पुत्र (तिम्मा व इम्माड़ि नरसिंह) थे। उसकी मृत्यु के समय दोनों पुत्र अल्पायु थे। सालुव नरसिंह का सेनानायक नरसा नायक उनका संरक्षक बना। अवसर पाकर नरसा नायक ने पूरी सत्ता अपने हाथ में ले ली। पहले तिम्मा का राज्याभिषेक किया गया किन्तु कुछ समय पश्चात् उसके एक शत्रु ने उसकी हत्या कर दी।

इसके बाद उसके छोटे भाई इम्माड़ि नरसिंह को गद्दी पर बैठाया गया। इम्माड़ि नरसिंह के वयस्क होने पर उसका अपने संरक्षक नरसा नायक से विवाद हो गया। शासन की पूरी शक्ति नरसा नायक के हाथों में केन्द्रित थी अतः उसने इम्माड़ि नरसिंह को बंदी बनाकर पेनुकोंडा के किले में नजरबंद कर दिया। नरसा नायक ने अपने अगले 12-13 वर्षों में सफलतापूर्वक शासन किया तथा विजयनगर के खोए हुए प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया। 1498 ई. में उसने बीजापुर के आदिल खां को पराजित किया।

सुदूर दक्षिण के चोल, पाण्डय और चेर शासकों को भी विजयनगर की प्रभुसत्ता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। उसने बीदर के कासिम बारीद के साथ रायचूर दोआब के अनेक किलों पर अधिकार कर लिया। 1505 ई. में नरसा नायक के पुत्र वीर नरसिंह ने इम्माड़ि नरसिंह की हत्या कर स्वयं सिंहासन पर अधिकार कर लिया तथा विजयनगर के तृतीय राजवंश तुलुव वंश की स्थापना हुई।

वीर नरसिंह द्वारा इम्माडि नरसिंह की हत्या कर शासन पर अधिकार करने की घटना को द्वितीय बलापहार (द्वितीय अपहरण) कहा गया।

III. तुलुव वंश (1505-1565 ई.)

तुलुव वंश विजयनगर का तीसरा राजवंश था। इसकी स्थापना वीर नरसिंह ने की थी। तुलुव वंश के कुल छह शासकों ने 60 वर्ष तक शासन किया। कृष्ण देव राय केवल तुलुव वंश का नहीं बल्कि विजयनगर साम्राज्य का महानत‍ शासक था। तिरुमल तुलुव वंश का अन्तिम शासक था।

1. वीर नरसिंह (1505-1509 ई.)

वीर नरसिंह तुलुव वंश का संस्थापक था। इसने केवल 4 वर्ष तक शासन किया। इम्माड़ि-नरसिहं की हत्या कर सिंहासन पर अधिकार करने के कारण उसके विरुद्ध असंतोष फैल गया।

वीर नरसिंह अपने अल्प शासन काल में आन्तरिक विद्रोहों व वाह्य आक्रमणों का मुकाबला करता रहा। वीर नरसिंह ने भुजबल की उपाधि ग्रहण की थी। पुर्तगाली गवर्नर अल्मीड़ा से उसके द्वारा लाए गए सभी घोड़ों को खरीदने हेतु एक समझौता किया। उसने विवाह कर को हटा कर एक उदार नीति शुरू किया था। 1509 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद इसका छोटा भाई कृष्ण देवराय शासक बना।

2. कृष्णदेव राय (1509-1529 ई.)

कृष्णदेव राय 1509 ई. में गद्दी पर बैठा। वह विजयनगर साम्राज्यं का महानतम शासक था। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में जिन भारतीय राज्यों का उल्लेख किया है, उनमें 5 मुस्लिम (बंगाल, दिल्ली, मालवा, बहमनी व गुजरात) तथा हिन्दू राज्य (मेवाड़ व विजयनगर) थे। उसने विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय को तत्कालीन भारत का सबसे शक्तिशाली शासक कहा है।  कृष्ण देवराय का शासनकाल विजयनगर राज्य के ऐश्वर्य व शक्ति का चर्मोत्कर्ष था। उम्मूत्तूर का सामंत शासक गंगाराम एक स्वतंत्र शासक की भांति व्यवहार कर रहा था।

उड़ीसा का गजपति नरेश प्रतापरुद्र का उदयगिरि के तटवर्ती क्षेत्रों पर अधिकार था। उस समय तक बहमनी राज्य 5 राज्यों में विभाजित हो गया था। परन्तु वे सभी विजयनगर के शत्रु थे। मालाबार में पुर्तगालियों ने कालीकट के जमोरिन की शक्ति की अवज्ञा की और कोचीन व कानानोर में अपने मोर्चेबंद कारखाने स्थापित किए। उन्होंने 1509 ई. में कालीकट तथा मिस्र की संयुक्त नौसेना को भी पराजित कर दिया तथा भारतीय समुद्रों में अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की। पुर्तगाली अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए विजयनगर की सहायता चाहते थे।

1570 ई. पुर्तगाली अल्बुकर्क ने अपने एक दूत फादर लुई को कालीकट के विरुद्ध युद्ध संबंधी समझौता करने और भत्कल व मंगलौर के मध्य एक कारखाने की अनुमति मांगने के लिए कृष्णदेव राय के पास भेजा। इन सुविधाओं के बदले में कृष्ण देव राय को गोवा की विजय में सहायता तथा घोड़ों की पूर्ति का एकाधिकार देने का वचन दिया किन्तु कृष्ण देवराय एक कुशल राजनीतिज्ञ और दूरदर्शी शासक था।

पुर्तगाली दूत को स्पष्ट उत्तर देकर वापस लौटा दिया। 1509 कृष्णदेव राय की कठिनाईयों का लाभ उठाकर बीदर के सुल्तान मुहम्मदशाह ने विजयनगर पर आक्रमण किया। किन्तु अदोनी के निकट विजयनगर की सेनाओं ने उसे पराजित किया।

इसी युद्ध में बीजापुर के शासक युसुफ आदिल शाह मारा गया। आदिशात की मृत्यु के बाद बीजापुर में अव्यवस्था फैल गयी क्योंकि युसुफ आदिल का उत्तराधिकारी इस्माइल अल्पव्यस्क था।

इस स्थिति का लाभ उठाकर कृष्णदेव राय ने 1512 ई. में रायचूर व गुलबर्ग के किले पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् उसने बीदर पर आक्रमण कर बहमनी शासक महमूद शाह को कासिम बरीद के अधिकार से निकाल कर पुन: सिंहासनारूढ़ किया और यवनराज्य स्थानाचार्य की उपाधि ग्रहण की।

गजपतियों को पराजित कर कृष्णदेव राय ने वहां से बालकृष्ण की मूर्ति विजय स्मारक के रूप में ले आया तथा विजयनगर में कृष्णस्वामी मंदिर में एक रत्नजड़ित मंडप में प्रतिमा की स्थापना की थी।

पुर्तगाली यात्री एडवर्डी बारबोसा व डोमिंगो पायस कृष्णदेव राय के समय में भारत आए तथा विजयनगर की यात्रा की थी।

सांस्कृतिक उपलब्धि तेलुगू के 8 महान् विद्वान् जिन्हें अष्टदिग्गज कहा जाता था निवास करते थे। अष्टदिग्गज तेलुगू कवियों में पेड्डाना सर्वप्रमुख था जो संस्कृत एवं तेलुगू दोनों भाषाओं का ज्ञाता था।

‘हास्पेट’ नामक नगर अपनी पत्नी की स्मृति में बसाया था। अनेक भव्य | भवनों व मंदिरों का निर्माण करवाया जिसमें हजारा मंदिर व विदृद्धल स्वामी के मंदिर प्रमुख हैं।

इसके अतिरिक्त चिदम्बरम मंदिर का निर्माण भी करवाया था। 1529 ई. में कृष्ण देव राय की मृत्यु हो गयी।

3. अच्युत राय (1529-1542 ई.)

कृष्णदेव राय अपनी मृत्यु के पूर्व ही अपने चेचेरे भाई अच्युत देव राय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया क्योंकि उसका एकमात्र पुत्र जो 18 महीने का था सिंहासन के योग्य नहीं था। किन्तु कृष्णदेव राय के जमाता, रामराय को यह व्यवस्था पसंद नहीं थी ।

उसने अपने साले सदाशिव का दावा प्रस्तुत किया जबकि अच्युतदेव साले सलक राज तिरुमल व चिन तिरुमल ने अच्युत का समर्थन किया। फलस्वरूप गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी। रामराय के प्रयत्नों को विफल करने 1 के लिए अच्युत देवराय ने अपना दो बार राज्याभिषेक दो अलग-अलग स्थलों पर करवाया था।

19 अन्त में अच्युत देवराय ने रामराय को शासन में सहभागी बनाकर सत्ता के लिए संघर्ष को समाप्त किया।

अच्युतदेव राय के समय में ही पुर्तगालियों ने तूतीकोरिन के मोती उत्पादक क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इसी के समय में पुर्तगाली यात्री जूनीज ने भारत को यात्रा की थी। वह कुछ समय तक अच्युतदेव राय के दरबार में भी रहा। नूनीज घोड़े का व्यापारी था। उसने अपनी पुस्तक क्रानिकल ऑफ नूनीज में विजयनगर साम्राज्य के प्रारम्भ से लेकर अच्युतदेवराय के शासन अंतिम वर्षों का इतिहास प्रस्तुत किया है। अच्युतदेव राय का विवाह पाण्ड स्वतंत्र प्रांतीय राजकुमारी वरदाम्बिका से हुआ था।

1542 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। राजनाथ डिंडिम अच्युत देवराय का दरबारी कवि था। उसने व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित अच्युतरायम्युदय नामक संस्कृत काव्य की रचना की थी। रामराय ने तिरुमल को कई युद्धों में परास्त कर अच्युतदेव राय के भतीजे सदाशिवराय को गद्दी पर बैठाया।

4. सदाशिव राय (1542-1570 ई.)

सदाशिव राय के शासन काल में वास्तविक सत्ता रामराय के हाथों में थी। शासन पर अपना नियंत्रण रखने के लिए उसने पुराने विश्वासपात्र अधिकारियों को हटाकर उनके स्थान पर अपने व्यक्तियों को नियुक्त किया।

तालिकोटा (राक्षसी-तांगड़ी) का युद्ध (1565 ई.)

तालीकोटा का युद्ध दक्कन के संयुक्त सैनिक संघों व विजयनगर के मध्य हुआ था। इस युद्ध के समय विजयनगर का शासक सदाशिव राय था। विजयनगर के विरुद्ध एक सैनिक महासंघ का गठन किया। जिसमें अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा व बीदर शामिल थे।

गोलकुण्डा व बरार के मध्य पारस्परिक शत्रुता के कारण बरार इसमें शामिल नहीं था। दक्कनी राज्यों ने पारस्परिक वैवाहिक सम्बन्धों के द्वारा इस महासंघ को मजबूत बनाया। अहमदनगर के हुसैन निजाम शाह की पुत्री जमाली बीबी का विवाह इब्राहीम कुतुबशाह के साथ हुआ था।

हुसैन निजामशाह ने अपनी दूसरी पुत्री चांदबीबी का विवाह बीजापुर के अली आदिल के साथ किया। अली का बहन हदिया सुल्ताना का विवाह हुसैन निजामशाह के पुत्र मुर्तजा से हुई। युद्ध की शुरूआत बीजापुर के सुलतान अली आदिल ने विजयनगर से रायचूर मुद्गल, अदोनी किलो की वापसी की मांग कर की।

रामराय ने इस मांग को ठुकरा दिया। दक्कनी महासंघ की सेनाएं राक्षसी-तोगड़ी की ओर बढ़ी। 23 जनवरी, 1565 ई. को ऐतिहासिक तालिकोटा का युद्ध हुआ।

इसी युद्ध में अहमदनगर के हुसैन निजाहशाह ने रामराय को मार कर चिल्लाया ‘अब मैंने तुम से बदला ले लिया है, अल्लाह जो सजा देना चाहे दे।’ रामराय का भाई वेंकटाद्रि भी मारा गया। विजयी सेना नगर में प्रवेश कर उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया।

सेवेल जो इस युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी था जिसने ‘ए. फारगटन एम्पायर’ नामक पुस्तक की रचना की है। तालिकोटा के युद्ध के तत्काल बाद विदेशी यात्री सीजर फ्रेडरिक ने विजयनगर की यात्रा की एवं स्थिति का वर्णन किया।

IV. अरबीडु वंश (1570-1652 ई.)

तालीकोटा युद्ध के पश्चात् रामराय के भाई तिरुमल ने सदाशिव को लेकर। पेनुकोडा आ गया तथा यही से शासन करना प्रारम्भ किया। उसने विजयनगर के चतुर्थ राजवंश अरबी वंश की स्थापना हुई।

1. तिरुमल (1570-72 ई.)सदाशिव राय को गद्दी से उतार कर तिरुमल ने विजयनगर के चतुर्थ राजवंश अरविडु वंश की स्थापना हुई। इसने विजय नगर के स्थान पर पेनुकोंडा को अपनी राजधानी बनाया क्योंकि तालिकोटा के युद्ध में विजयनगर नष्ट हो गया था। तिरुमल ने विषम परिस्थितियों में गद्दी प्राप्त की थी।

 2. श्रीरंग-I (1572-85 ई.)

श्रीरंग-1, तिरुमल का ज्येष्ठपुत्र था। उसकी मृत्यु के बाद वह गद्दी पर बैठा। श्रीरंग प्रथम की उपलब्धियों में मत्स्य क्षेत्रीय तट के उदंड मावरों का दमन किया तथा मुस्लिमों से अहोवलम जिला पुनः जीत थी।

3. वेंकट-II (1586-1614 ई.)

श्रीरंग-I का कोई पुत्र नहीं था। 1585 ई. में उसके मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई वेंकट-II शासक बना। यह अरविडु वंश का महानतम शासक था जिसने विजयनगर साम्राज्य को अक्षुण्य रखने में सफल रहा। उसने चन्द्रागिरी को अपना मुख्यालय बनाया।

कालान्तर में मुख्यालय पेनूकोंडा स्थानान्तरित की थी। 1610 ई. में वेंकट-I ने डचों को पुलिकट में कारखाना खोलने की अनुमति के साथ-साथ व्यापार की अनुमति प्रदान किया। उसके इस कार्य से विदेशियों की दृष्टि में साम्राज्य की प्रतिष्ठ बढ़ी जिसके फलस्वरूप चन्द्रगिरि में अनेक राजनयिक मंडल आए और उसके दरबार में उपस्थिति हुए।

स्पेन के फिलिप-III से सीधा पत्र व्यवहार भी था। 1598 ई. में उसने दरबार में ईसाई पादरियों का स्वागत किया तथा उन्हें अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में धर्म प्रचार तथा गिरजाघर बनवाने की पूर्ण स्वतंत्रता दी। उसने पुर्तगालियों को वेल्लोर में गिरजाघर निर्मित करने की अनुमति प्रदान की थी।

वेंकट – II के मृत्यु के साथ ही अरविडु वंश व विजयनगर दोनों का पतन प्रारम्भ हो गया। वेंकट-II के बाद परवर्ती शासकों में श्रीरंग द्वितीय (1614 ई.), रामदेव (1614-30 ई.), वेंकट-III (1630-42 ई.) व श्रीरंग तृतीय (1642-52 ई.) शासक हुए। वेंकट तृतीय का एक शक्तिशाली मंत्री दरमेला वेंकटप्पा था। जिसने वेंकट तृतीय के काल में 1639 ई. में अंग्रेज को कोवल में अनुदान तथा मद्रास पट्टद्धम में दुर्ग बनवाने की अनुमति प्रदान की, जो आगे चलकर फोर्टी सेंट जार्ज बना।

श्रीरंग तृतीय अरवीडु वंश व विजयनगर का अन्तिम शासक था।

Related Post –

विजयनगर साम्राज्य से संबंधित प्रश्न

1. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब और किसने की थी?

उत्तर – विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर व बुक्का ने 1336 ई. की थी, हरिहर प्रथम संगम वंश का प्रथम तथा विरुपाक्ष द्वितीय (1465-86 ई.) अन्तिम शासक था। हरिहर के बाद उसका भाई बुक्का – I शासक बना।

2. विजयनगर साम्राज्य के 4 राजवंश के नाम क्या थे?

उत्तर – 1. संगम वंश 2. सालुव वंश (1485-1505 ई.) 3. तुलुव वंश (1505-1565 ई.) 4. अरबीडु वंश (1570-1652 ई.) – संगम वंश विजयनगर साम्राज्य के 4 राजवंशों में प्रथम था। हरिहर व बुक्का संगम के पुत्र थे। इन्होंने अपने पिता संगम के नाम पर इस वंश का नाम संगम वंश रखा।

3. विजयनगर साम्राज्य की प्रमुख राजधानी कौन सी थी?

उत्तर – अनगोण्डी, विजयनगर, पेनुकोण्डा तथा चन्द्रगिरि, हम्पी (हरितनावती) विजयनगर की पुरानी राजधानी थी।

4. विजयनगर का वर्तमान नाम क्या है?

उत्तर – विजयनगर का वर्तमान नाम हम्पी (हस्तिनावती) है।

Leave a Comment