Modern History in Hindi: (1757-1857 ई.) के मध्य सैनिक विद्रोह



भारत में अंग्रेजी सत्ता की स्थापना के साथ ही उसका प्रतिरोध भी आरंभ हो गया। कंपनी सरकार की राजनीतिक व आर्थिक नीतियों के परिणामों से समग्र के विभिन्न वर्गों (विस्थापित शासकों, जमींदारों, धार्मिक नेताओं, फकीरों, सियों, सैनिकों, किसानों व जनजातियों) ने अनेकों बार प्रतिरोध और विद्रोह किये- Modern History in Hindi: (1757-1857 ई.) के मध्य सैनिक विद्रोह

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भारत के भिन्न-भिन्न भागों में ऐसे विरोध अनेकों बार हुए। इन विद्रोहों में सबसे बड़ा 1857 ई. का विद्रोह (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम युद्ध था) 1957 से 1857 ई. के पूर्व लगभग 100 वर्षों में भारत के किसी न किसी भाग में छोटे-बड़े विद्रोह हुए। इन विद्रोहों को मोटे तौर पर 4 भागों में विभक्त किया गया है। जिसका विवरण ग्राफिक्स में दिया गया है।

इन विद्रोहों का स्वरूप व नेतृत्व अलग-अलग था, तथापित क्षेत्र विशेष में इन्हें जन-समर्थन प्राप्त था। इन सभी विद्रोहों का मूल कारण प्रभावित वर्ग में व्याप्त असंतोष था। (1757-1857 ई.) के मध्य सैनिक विद्रोह का दमन सरकार ने कर दिया, परंतु इन्होंने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 20वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में साम्राज्यवाद विरोधी विचारधारा को मजबूती प्रदान किया।

सन्यासी विद्रोह (1763-1800 ई.)

क्षेत्र :  बंगाल व बिहार
नेतृत्व :  मंजर शाह
नारा :  ओड्म वन्देमातरम्
दमनकर्ता अंग्रेज :  गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स
प्रमुख नेता :  मंजर शाह, मूसा शाह, चिराग अली, कृपानाथ, नुरूल मुहम्मद, पीताम्बर, अनूप नारायण, श्रीनिवास, हिंदू महिला (1. भवानी पाठक, 2. देवी चौधरानी)

विवरण : प्लासी के युद्ध 1757 के बाद उपनिवेशवादी शोषण नीति से बगाल में ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना हुई।

1760 ई. से उनके विरूद्ध सन्यासी विद्रोह आरंभ हो गया। यह विद्रोह एक सामाजिक धार्मिक सम्प्रदाय के अनुयायियों जिन्हें सन्यासी कहा जाता था।

सन्यासी के द्वारा आरंभ होने के कारण संघर्ष को संयासी विद्रोह कहा आता है। ये संयासी शंकराचार्य के अनुयायी व गिरि संप्रदाय के थे। इनके आक्रमण की पद्धति गुरिल्ला युद्ध तकनीक थी।

इस विद्रोह को सन्यासी विद्रोह नाम बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने दिया था।

यह विद्रोह 1763 ई. से बंगाल और बिहार के क्षेत्रों में शुरू हुआ और 1800 ई. तक चलता रहा।

मूल रूप से यह एक कृषक विद्रोह था लेकिन इसमें जनता की भी भागीदारी थी। जैसे- कारीगर, सैनिक, फकीर और संयासी भी शामिल थे।

विद्रोही ईस्ट इंडिया कंपनी के माल गोदामों को लूटते थे।

बंगाल के उपन्यासकार बंकिम चन्द्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंद मठ का कथानक इस संयासी विद्रोह पर आधारित रखा था।

अहोम विद्रोह (1828-33 ई.)

क्षेत्र :  असम
नेतृत्व :  गोमधर कुंवर व रूपचन्द्र कोनार

विवरण :  असम के अहोम अभिज वर्ग के व्यक्ति थे। 1824 में बर्मा युद्ध के अवसर पर कम्पनी की सेवा अहोम होकर भेजी गयी थी।

सरकार ने युद्ध की समाप्ति पर लेना वापस लौटाने का आश्वासन दिया था। बाद में सरकार ने अपना वचन पूरा नहीं किया तथा बर्मा के दक्षिणी भाग को अपने अधीन कर लिया।

अंग्रेजों ने जब अहोम प्रदेश को भी अपने राज्य में सम्मिलित करने का प्रयास किया तो यह विद्रोह फूट पड़ा। 1828 ई. में अहोम लोगों ने गोमधर कुंवर को अपना राजा घोषित किया रंगपर पर चढ़ाई करने की योजना बनायी, परंतु असपफल रहा। गोमधर ने -सर्मपण कर दिये और उसे 7 वर्ष की सजा सुनायी गयी थी।

1830 ई. को दूसरे विद्रोह की योजना बनी और रूपचन्द्र कोनार को अहोमो अपना राजा बनाया। ये भी गिरफ्तार हो गये और इन्हें 14 वर्ष का निर्वासन करना पड़ा।

1833 ई. को उत्तरी असम महाराज पुरंदर सिंह को दे दिया गया। इस तरह अहोम विद्रोह समाप्त हो गया।

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रंगपुर का विद्रोह (1783 ई.)

क्षेत्र : रंगपुर (पश्चिम बंगाल)
नेतृत्व : धीरज नारायण व नुरूलुद्दीन

विवरण : भारत में ब्रिटिश शासन का आरंभ बंगाल से हुआ। इसलिए कम्पनी द्वारा भूमि व राजस्व व्यवस्था में परिवर्तन भी पहले यही से शुरू किये।

इस क्षेत्र में सरकार ने लगान की राशि में वृद्धि कर दी एवं कड़ाई से वसूली का प्रयास किया, इसके प्रतिरोध में विद्रोह हुआ।

किसानों ने धीरज नारायण व नुरूलुद्दीन के नेतृत्व में अपना उपद्रव जारी रखा, क्षेत्र से लगान की वसूली रोकी गई। धीरज नारायण को विद्रोहियों ने अपना नवाब व नुरूलुद्दीन को नवाब का बख्शी नियुक्त किया गया।

विद्रोह का व्यय चलाने हेतु वे स्वयं ही कर वसूलने लगे। अनेक विद्रोहियों कोरंगपुर से बाहर निर्वासित कर दिया गया व विद्रोह शांत हो गया।

फरैजी/ फरायजी आंदोलन (1804 ई.)

क्षेत्र : बंगाल
नेतृत्व : दादू मियां

विवरण : फरायजी शब्द का तात्पर्यः अल्लाह का हुक्म मानने वाला। यह बंगाल के फरीदपुर जिले के मुस्लिमों का एक संप्रदाय है।

फैरजी आंदोलन उग्रसुधारवादी विचारधारा से प्रभावित था। फैरजी मूलतः एक धार्मिक विचारधारा थी, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समाज से प्रचलित कुरीतियों को दूर करना था।

फरैजी इस्लाम धर्म के प्रतिकूल प्रथाओं को समाप्त कर इस्लाम के सच्चे स्वरूप की स्थापना करना चाहते थे। वे ईश्वर के समक्ष सभी मनुष्यों को समान मानते थे।

उनकी धारणा थी कि भूमि पर ईश्वर का अधिकार है। इसलिए किसी को भी लगान वसूलने का अधिकार नहीं है।

फरैजियों की तुलना रेड रिपब्लिकन्स के साथ की गयी है। 

शरीयतुल्लाह की मृत्यु के पश्चात् आंदोलन का नेतृत्व उनके पुत्र दादूमियां ने किया था।

1857 ई. के विद्रोह आरंभ होने पर दादूमियां को पुनः गिरफ्तार कर लिये गये। 3 वर्ष बाद मृत्यु हो गयी और आंदोलन की प्रगति धीमी पड़ गई।

फरैजीआंदोलनद्वाराप्रथम बार बंगाल के किसानों को संगठित होकर सामंती अत्याचारों का सामना करने का अवसर मिला था। यह वस्तुतः जनआंदोलन था।

बहावी आंदोलन (1821 ई.)

उपनाम:  वली उल्लाह आंदोलन
क्षेत्रः बिहार व बंगाल
नेतृत्व: सैय्यद अहमद बरेलवी 
पुनजीवितत करने का श्रेय : विलायत अली व इनायत अली (पटना)

प्रमुख केंद्रः पटना (बिहार)

विवरण: 1821 में सैय्यद अहमद हज करने मक्का गए वहीं पर उनकी मुलाकात अब्दुल बहाव से हुई जिनके विचारों से वे बहुत प्रभावित हुए।

शिरात-ए-मुस्तकिन नामक फारसी ग्रंथ से सैय्यद अहमद के विचारों को संकलित किया गया।

सैय्यद अहमद ने एकेश्वारवाद व जिहाद (धर्मयुद्ध) पर बल दिया। उन्होंने हिजरल (दुश्मनों के देश से बाहर जाने) के महत्व परभी बल दिया।

स्वरूपः यह एक पुनरूद्धार आंदोलन था।

धार्मिक उद्देश्यः भारत में इस्लामी समाज की बुराइयों को दूर करना।

राजनीतिक उद्देश्यः भारत से अंग्रेजों को बाहर कर मुस्लिम शक्ति का पुनरूत्थान करना।

विशेषः 1857ई. के विद्रोह ने बहालियों ने कोई भूमिका नहीं निभाई थी

खासी विद्रोह (1828-33)
क्षेत्रः मेघालय
प्रमुख नेता: राजा तीरथ सिंह
विवरण: ईस्ट इंडिया कंपनी ने खासी पहाड़ी के कामरूप व सिलहट पर अपना अधिकार प्राप्त कर लिये थे। उनकी योजना असम व सिलहट के बीच एक सैनिक मार्ग का निर्माण करना था जिससे बर्मा युद्ध में सेना भेजने में आसानी हो।
>आरंभ में खासी पहाड़ियों के राजा तीरथ सिंह इनके लिए तैयार हो गये। बाद में जब अंग्रेजों ने इस क्षेत्र पर अपना प्रशासन स्थापित करने की कोशिश की तो तीरथ सिंह ने इसका विरोध किया।
>1829 ई. को राजा तीरथ सिंह ने सरकार के विरूद्ध मुस्लिम युद्ध आरंभ कर दिये।
>तीरथ सिंह को निर्वासित कर ढाका भेज दिया गया वही पर 1834 ई. में उनकी मृत्यु हो गई। तीरथ सिंह के मृत्यु के बाद विद्रोह समाप्त हो गया।
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पागलपंथी विद्रोह (1813-1833 ई.)

क्षेत्रः पश्चिम बंगाल

प्रमुख नेतृत्वः करमशाह / टीपू मीर

विवरणः पागलपंथ उत्तर-पूर्व भारत का एक धार्मिक सम्प्रदाय था। जिले उत्तरी बंगाल के करमशाह ने चलाया था। करमशाह का पुत्र तथा उत्तरधिकारी टीपू मीर धार्मिक तथा राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित था। जमींदारों के मुजारों पर किये गये अत्याचारों के विरूद्ध 1813 ई. में विद्रोह हुआ।

कच्छ का विद्रोह (1819-31)

नेतृत्व: भारमल व झरेजा

कारण: कच्छ के राजा भारमल को जब अंग्रेजों ने हटाकर उसके अल्प वयस्क पुत्र को गद्दी पर बिठा दिया तो भारमल और उसके समर्थक सरदार झरेजा ने विद्रोह कर दिये। 1831 ई. में भारमल को पुनः गद्दी पर बिठाने के बाद यह विद्रोह शांत हो गया।

आदिवासियों के आंदोलन

चुआर विद्रोह (भूमिन विद्रोह) (1768 ई.)
नेतृत्वः जगन्नाथ
क्षेत्रः चुआर या भूमिन बंगाल में मेदिनापुर जिले में रहते थे।
उद्देश्यः अकाल व बढ़ते हुए भूमि कर और अन्य आर्थिक संकटों के कारण मेदिनीपुर जिले के आदिम जाति के चुआर लोगों ने अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया।
हो विद्रोह (1820-1833 ई.)
क्षेत्रः छोटा नागपुर (बिहार) नेतृत्वः गंगा नारायण
कारण: छोटा नागपुर के हो आदिवासियों ने बढ़े हुए भूमिकर के कारण जमीदारों एवं अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह
1820-32 ई. तक जारी रहा।
कोल विद्रोह (1831-32 ई.)
क्षेत्रः सिंहभूम के निकट सोनपुरा परगना
नेताः बुद्धों भगत व गंगा नारायण
विवरणः छोटा नागपुर क्षेत्र के मुंडा औरांव, हो, महाली आदि जनजातियां निवास करती है। इन्हें मैदानी लोग कोल कहते हैं।
कोलों ने छापामार युद्ध प्रणाली के द्वारा सेना से संघर्ष किया। पूर्वी भारत में शोषण के विरूद्ध कोलो ने प्रथम बार संगठित रूप से सरकार और उसके समर्थकों के विरूद्ध सशस्त्र आंदोलन आरंभ किया।
सैनिकों के विद्रोह (1778 ई.)
*1778 ई. में ही जब वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस के राजा चेतसिंह पर अधिक धन के लिए दबाव डालना आरंभ किया तो सेना ने राजा की मदद की और अंग्रेजी सिपाहियों का विरोध किया।
*लॉर्ड वेलेजली ने जब अवध के नवाब वजीर अली को गद्दी से हटा दिया तब नवाब के सैनिकों ने ब्रिटिश सेना से युद्ध किया।
*1844 ई. में पुनः फिरोजपर की 34वीं रेजीमेंट, 7वीं बंगाल घुड़सवार सेना, 164वीं रेजिमेंट और रॉवलपिंडी की 22वीं रेजिमेंट ने अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए विद्रोह कर दिया। इन सभी विद्रोहों को तो सरकार ने दबा दिया परंतु असंतोष की भावना को समाप्त करने में सरकार विफल रही।
संथाल विद्रोह (1855-56 ई.)
उपनाम: हुल आंदोलन
क्षेत्र: दामन-ए-कोह के नाम से ज्ञात भागलपुर से राजमहल तक का भू-भाग संथाल बाहुल्य क्षेत्र था।
नेतृत्वः सीद्ध और कान्हू
कारण: संथाल विद्रोह आर्थिक कारणों से उत्पन्न हुआ था लेकिन शीघ्र ही इसका उद्देश्य विदेशी शासन को समाप्त करना हो गया। इस विद्रोह के बाद अंग्रेजी सरकार ने 1855ई. में 37वें रेगुलेशन के अनुसार संस्थाल क्षेत्र को पृथक नन रेगुलेशन जिला घोषित कर दिया।
विशेष: संथाल बीरभूम, बांकूरा, मुर्शिदाबाद, पाकुर, दुमका, भागलपुर और पूर्णिया जिले के रहने वाले थे।
*जहां संथाल सबसे ज्यादा संख्या में रहते थे, उसे दमन-ए-कोह (संस्थाल) परगना के रूप में जाना जाता था।
*जब इस इलाके में संथालों ने जंगल साफ करके खेती करनी शुरू की तो पड़ोस के महेशपुर व पाकुर के राजाओं ने संथाल गांवों को जमींदारों और महाजनों के हवाले कर दिया। इस क्षेत्रों में बाहरी लोगों संथाल इन्हें दीवू कहते थे।
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कूका विद्रोह (1860-70 ई.)

क्षेत्र: पंजाब

नेतृत्वः भगत जवाहर मल

उपनामः सियन साहिब व बालक सिंह

स्वरूप: यह आंदोलन पंजाब में एक धार्मिक राजनैतिक आंदोलन था। इसका नेतृत्व बालक सिंह ने किया था।

धार्मिक लक्ष्यः सिखवाद का धर्मसुधार।

राजनैतिक लक्ष्यः अंग्रेजों को पंजाब से भगाकर सिखों के प्रभुत्व को पुनः स्थापित करना था।

विशेष: 1882 में रामसिंह कुका को इस आंदोलन का जिम्मेदार घोषित कर रंगून भेज दिया गया जहां 1885 में उनकी मृत्यु को गई।

मुण्डा विद्रोह (1893-1990 ई.)

क्षेत्रः रांची के दक्षिण क्षेत्रों में छोटा नागपुर

उपनामः मुण्डा विद्रोह उलगुलान के नाम से प्रसिद्ध हैं

नेतृत्वः बिरसा मुंडा

विवरणः बिरसा मुंडा एक बंटाईदार का पुत्र था, उसे मिशनरियों से थोड़ी बहुत शिक्षा मिली थी।

वह जर्मन मिशनरियों के प्रभाव में आकर ईसाई बन गया था किंतु पुनः उसने अपने पुर्वजों के धर्म को अपना लिया।

मुंडा ने एकेश्वरवाद की स्थापना पर बल दिया। एक मान्यता के अनुसार 1895 ई. में बिरसा को परमेश्वर के दर्शन हुए और वह पैगम्बर होने का दावा करने लगा। उसका कहना था कि उसके पास निरोग रहने की चमत्कारी शक्ति है।

कारण: मुंडों की पारस्परिक भूमि व्यवस्था खूटकट्टी (मुंडारी का जीमंदारी) या व्यक्तिगत भूस्वामित्व वाली भूमि व्यवस्था में परिवर्तन के विरूद्ध, किंतु बाद में बिरसा मुंडा ने इसे धार्मिक राजनीतिक आंदोलन का रूप प्रदान किया।

1899 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर बिरसा के अनुयायियों ने रांची और सिंहभूम के कुछ क्षेत्रों में अपनी आक्रामक गतिविधियां प्रारंभ की।

इस विद्रोह में मुंडा स्त्रियों ने भी भाग लिया। 1900 में विद्रोहियों ने पुलिस को अपना निशाना बनाया परंतु जनवरी, 1900 में सैलरकेब पहाड़ी पर ब्रिटिश सेना द्वारा पराजित हुए।

कुछ दिन बाद बिरसा पकड़ा गया और उसकी जेल में मृत्यु हो गयी। उसके मृत्यु के बाद यह विद्रोह शांत हो गया।

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जनजातीय/आदिवासी विद्रोह
*आदिवासी गांव से दूर क्षेत्रों में रहते थे इन्हें जनजातीय शब्द प्रथम बार ठक्कर बप्पा ने सम्बोधित किया था। आदिवासियों के नेता को भगत कहा जाता है।
*औपनिवेशिक भारत में जनजातीय आंदोलन, अन्य समुदायों के आंदोलनों से भिन्न थे। ये आंदोलन अत्यधिक हिंसक थे। 1778 – 1947 तक लगभग 701 जनजातीय आंदोलन हुए।
आदिवासी आंदोलन 3 चरणों में विभाजित
1. प्रथम चरण (1795-1860): इसके अंतर्गत आदिवासी विद्रोहों में पहाड़िया विद्रोह, खोंड विद्रोह, कोल विद्रोह, संथाल विद्रोह, आदि प्रमुख हैं।
2. द्वितीय चरण (1860-1920): इसके आदिवासी विद्रोहों में, खारवाड़ विद्रोह, भील विद्रोह, नैकदा विद्रोह, कोया विद्रोह, तथा मुंडा विद्रोह प्रमुख हैं।
3. तृतीय चरण (1920 केबाद): इसके अंतर्गत आदिवासी विद्रोहों में तानाभगत आंदोन, चेंचू आंदोलन, रम्पा विद्रोह, तथा जंगल सत्याग्रह प्रमुख हैं।
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