Maurya Samrajya: 322 ईसा. मौर्य साम्राज्य के बारे में कुछ रोचक तथ्य



मौर्य साम्राज्य (maurya samrajya) की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने भारत में मगध के क्षेत्र में 322 ईसा पूर्व में की थी। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी, जो आधुनिक पटना है। Maurya Samrajya के कुछ रोचक तथ्य——–1. सांची का स्तूप 2. रामपुरवा स्तंभ पर स्थित बैल 3. लौरिया नंदनगढ़ स्थित अशोक स्तंभ 4. बराबर पहाड़ियों से निर्मित लोमश ऋषि की गुफा 5. शालभंजिका की मूर्ति, मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण.

Maurya Samrajya: मौर्य साम्राज्य
Maurya Samrajya: मौर्य साम्राज्य

सांची का स्तूप

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप सांची बौद्ध स्तूपों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां पहाड़ी पर मौर्य शासक अशोक ने विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था। यह ईंटों का बना था जिसके चारों ओर लकड़ी की बाड लगी थी।

Sanchi Stupa : Mauryan Empire
सांची का स्तूप: Sanchi Stupa

सांची के दीर्घकाल तक बौद्धधर्मसे संबंधित रहने के कारण इसका नाम चेतिया (चैत्यगिरि) प्रसिद्ध हुआ। अशोक द्वारा निर्मित महास्तूप शुंगकाल में पाषाण पट्टिकाओं से जड़ा गया। । लकड़ी के स्थान पर पाषाण वेदिका बनाई गयी तथा चारो दिशाओं में 4 तोरण (Gateways) लगा दिये गये।

बुद्ध के जीवन की घटनाओं व जातक कथाओं के चित्रों से भरे है और नीचे से – ऊपर तक अलंकृत हैं इन पर सिंह, हाथी, धर्मचक, यज्ञ, त्रिरत्न आदि के चित्र खुदे हुए है। वेदिकाओं पर अंकित लेखों में दानकर्ताओं के नाम सुरक्षित है जिन्होंने स्मारकों के निर्माण में योगदान किया। इनमें शासक, भिक्षु, सामान्य जन सभी है। मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार पर उत्कीर्ण लेख में सातवाहन शासक शातकर्णी का नाम है।

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रामपुरवा स्तंभ पर स्थित बैल

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रामपुरवा स्तंभ पर स्थित बैल: Maurya Samrajya

रामपुरवा स्तंभ पर स्थित बैल यह स्थल बिहार के चंपारण जिले में बेतिया के उत्तर में स्थित है। यहां अशोक के द्वारा स्तंभ लेख बनवाया गया जिसके शीर्ष पर बेल की मूर्ति स्थापित है। यह एक बौद्ध स्थल भी है

लौरिया नंदनगढ़ स्थित अशोक स्तंभ

यह नेपाल सीमा के निकट बिहार के चंपारण जिले में अवस्थित है। यह स्थल अशोक स्तंभ के लिए प्रसिद्ध है जो अशोक का सबसे सुरक्षित स्तंभ है। यह स्तंभ चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित है।

बराबर पहाड़ियों से निर्मित लोमश ऋषि की गुफा

यह बिहार के गया के निकट अवस्थित है। यह पहाड़ियों को काटकर बनाई गयी | गुफा के लिए प्रसिद्ध है। अशोक व उसके पौत्र दशरथ ने बहुत सी गुफाएं बनवाकर बौद्ध धर्म के आजीवक संप्रदाय को दान में दिये थे।

Maurya Empire
लोमश ऋषि की गुफा: Maurya Samrajya

कार्ले चैत्य गृह यह महाराष्ट्र के पूणे जिले के बाणघाट पहाड़ियों में अवस्थित है। यह बौद्ध चैत्य व विहारों के लिए प्रसिद्ध है। इसके ऊपर 4 सिंह विराजमान है। पश्चिमी भारत का सबसे लम्बा व सुरक्षित गृह है। २ मूलरूप से चैत्य गृह का विकास अशोक के काल ही हुआ था।

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शालभंजिका की मूर्ति

शालभंजिका की मूर्ति

यह संस्कृत भाषा में वर्णित शालभंजिका की मूर्ति है। ऐसा माना जाता था कि इस स्त्री द्वारा प्रभाव से वृक्षों में फूल खिल उठते व फल देने लगते थे। इस प्रकार शुभ प्रतीक मानकर सांची के स्तूप में अलंकरण के रूप में प्रयुक्त हुआ था। स्तूप के तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ पकड़कर झूलती हुई दिखती है।

अशोक का सारनाथ स्थित स्तंभशीर्ष

स्तम्भशीर्षों में सारनाथ के स्तंभ का सिंहशीर्ष सर्वोत्कृष्ट है। इसके फलक पर सजीव सिंह पीठ से पीठ सटाये हुए तथा चारों दिशाओं की ओर मुंह किये हुए दृढ़तापूर्वक बैठे हैं।

सिंहों के तने हुए शरीर की मांसपेशियां, लहलहाते हुए केश तथा गठीले अंग-प्रत्यंग अत्यंत सूक्ष्मता एवं चतुरता के साथ बनाये गये । हैं। ये चक्रवर्ती सम्राट अशोक की शक्ति के प्रतीक हैं।

इनसे चारों दिशाओं में उसके राज्य तथा धर्म के प्रचार की सूचना मिलती है, अथवा इन्हें शाक्य-सिंह बुद्ध की शक्ति का प्रतीक माना जा सकता है जो जन्मना चक्रवर्ती थे।

सिंहों के महत्व पर महाधर्मचक्र स्थापित था। जिसमें मलतः 32 तीलियां थीं। यह शक्ति के ऊपर धर्म की विजय का प्रतीक है जो बुद्ध तथा अशोक दोनों के व्यक्तित्व में दिखाई देता है।

सारनाथ स्थित अशोक का स्तंभ | सिंहों के नीचे की फलका पर चारों दिशाओं में चार चक्र बने हुए हैं जो धर्मचक्रप्रवर्तन के प्रतीक हैं। इसी पर 4 पशुओं (1.गज, 2.अश्व, 3.बैल, 4.सिंह) की आकृतियां उत्कीर्ण हैं जिन्हें चलती हुई अवस्था में दिखाया गया हैं।

4 हिंदू देवताओ: इंद्र, सूर्य, शिव तथा दुर्गा का प्रतीक माना है। हिंदू धर्म में हाथी इन्द्र का, अश्व सूर्य का, वृष शिव का तथा सिंह दुर्गा का वाहन माना गया है। ये पशु बुद्ध के जीवन की 4 महान घटनाओ का प्रतिनिधित्व करते हैं।

तदनुसार हाथी उनके गर्भस्थ होने (जिसमें उनकी माता माया ने एक श्वेत हाथी को स्वर्ण से उतर कर अपने गर्भ में प्रविष्ट होते हुए देखा था), वृष जन्म (बुद्ध की राशि वृष थी), अश्व गृह-त्याग तथा सिंह बुद्ध का प्रतीक है (जो स्वयं में शाक्य सिंह थे)। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ तो इसी स्तंभशीर्ष को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में चुना गया।

मौर्यकालीन कला

Maurya Dynasty

हड़प्पा की सभ्यता के पश्चात प्रथम बार भारतीय कला के स्पष्ट प्रमाण इस समय मिलते हैं। वास्तुकला व मूर्तिकला की अनोखी प्रगति हुई।

स्तूप- बोधगया के मंदिर के मूल-निर्माण का श्रेय भी अनेक विद्वान अशोक को देते है।

अशोककालीन गुफाएं -बिहार में गया जिला के अंतर्गत बराबर की पहाड़ियों में ऐसी गुफाएं बन गई, जहां से अशोक के अभिलेख भी मिले हैं। पहली गुफा (न्यग्रोध-गहा या सदामा-गुहा) अशोक के 12वें राजवर्ष की है। दसरी गुफा (विश्व-झोपड़ी-गुहा) भी (अभिषेक के 12 वर्षों के बाद) आजीवकों को दी गई। तीसरी गुफा (कर्णचौपड़) 19वें शासनवर्ष में संन्यासियों को बाढ़ से सुरक्षा के उद्देश्य से दी गई थी।

राज्य गुफाओं की निर्माण-शैली बौद्धशैली से मिलती-जुलती है। बाद में अशोक के पुत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी (गया जिला) की पहाड़ियों में 3 गुफाएं बनाकर आजीवकों को दान में दी थी।

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लोककला : Maurya Dynasty Hindi

मौर्यकालीन मूर्तियों में विशेष उल्लेखनीय परखम (मथुरा) से प्राप्त यक्ष की मूर्ति, पटना से प्राप्त यक्ष की 2 मूर्तियां, दीदारगंज से प्राप्त चामरधारिणी यक्षी की मूर्ति, लोहानीपुर से प्राप्त नग्न तीर्थंकर की मूर्ति, बेसनगर में मिली यक्षी-प्रतिमाएं हैं। दीदारगंज की यक्षी मौर्यकालीन मूर्तिकला की सर्वोत्तम कृति मानी जाती हैं। समूचे विश्व में इसके समकक्ष अन्य कोई भी मूर्ति नहीं है।

धार्मिक अवस्था – यज्ञव बलि की प्रथा अब भी प्रचलित थी। विभिन्न संस्कारों के पालन, वर्ण व आश्रम व्यवस्था की पवित्रता को बनाए रखने पर बल दिया जाता था। अर्थशास्त्र में देवताध्यक्ष नामक पदाधिकारी का उल्लेख मिलता है, जो मंदिरों औ देवताओं की देखभाल करता था। मंदिरों में पूजा, उत्सव तथा मेले लगा करते थे।

देवताओं के सहयोगियों के रूप में यक्ष-यक्षी की भी पूजा होती थी। भूत-प्रेत, जादू-मंतर का भी प्रभाव था। वृक्ष-पूजा व नाग-पूजा भी प्रचलित थी।

जैनधर्म

मौर्यकाल में अशोक के पूर्व जैनधर्म एक प्रभावी धर्म था। चन्द्रगुप्त मौर्य – जैनमतावलंबी था।यद्यपि भद्रबाहु से प्रभावित होकर उसने जैनधर्म अस्वीकार कर लिया था।

चन्द्रगुप्त ने अपने धार्मिक विश्वासों को प्रजा पर थोपने का प्रयास नहीं किया व धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। चन्द्रगुप्त के समय में ही जैनधर्म के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना घटी, जिसने जैनधर्म को 2 संप्रदायों में विभक्त कर दिया। जैन धर्म श्वेतांबर और दिगम्बर संप्रदायों में विभक्त हो गया। मगध के जैन श्वेताम्बर और भद्रबाहु के शिष्ट दिगम्बर कहलाए।

बौद्ध धर्म

बौद्धधर्म की मौर्यकाल में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। अशोक जैसे महान सम्राट के गागागो भागा के पाश पाश नौद्ध धर्म का भी व्यापक रूप से प्रसार हुआ। उसके प्रयासों से यह धर्म श्रीलंका एवं मध्य एशिया तक फैल गया।

अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बौद्धधर्म के उत्थान और प्रसार में रूचि ली। बौद्धसंघ में व्याप्त मतभेदों को दूर करने के लिए उसने बौद्धों की तीसरी संगीति पाटलिपुत्र में मोग्गलिपुत्त तिस्स के सभापतित्व में बुलाई गयी थी। इसकी पुष्टि सिंहली अनुश्रुती दीपवंश व महावंश से मिलता है।

शिक्षा व साहित्य

मौर्यकाल में भाषा, लिपि व साहित्य का भी विकास हुआ। संस्कृत, पालि व प्राकृत-भाषाओं, ब्राह्मी व खरोष्ठी-लिपियों का विकास भी इस समय हुआ। ब्राह्मण, जैन व बौद्धधर्मों के विकास ने धार्मिक साहित्य की रचना को प्रभावित किया। वेदांगों, गृह्यसूत्रों व धर्मसूत्रों की रचना इसी काल में हुई। इसी प्रकार बौद्ध त्रिपिटकों व जैनसूत्रों की भी रचना हुई।

कौटिल्य अर्थशास्त्र पुस्तक की तुलना पश्चात्य दार्शनिक मेकियावेली की पुस्तक प्रिंस से की जा सकती है। पाणिनी ने अष्टाध्यायी लिखी। सुबंधु इस युग का एक विख्यात नाटककार था जिसने स्वप्रवासवदत्ता की रचना की थी।

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मौर्यकालीन अर्थव्यवस्था

वार्ता = कृषि + पशुपालन + वाणिज्य

मौर्यों ने मिश्रित अर्थव्यवस्था (mixed economy) अपनाई, जिसके अंतर्गत, कृषि, व्यवसाय व व्यापार-वाणिज्य की प्रगति हुई और जिसके कारण मौर्ययुग की आर्थिक संपन्नता बढ़ी। अर्थशास्त्र से भी कृषि व्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है। राज्य कृषि पर नियंत्रण रखता था।

कृषि पद्धति – मौर्यकाल में सभी प्रकार की फसलों का उत्पादन होता था। अर्थशास्त्र में धान की फसल को सर्वोत्तम माना जबकि गन्ने की फसल को निकृष्टतम बताया गया हैं

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में 1 वर्ष में 3 फसलों के बगाये जाने का वर्णन मिलता है। 1. हैमनः रबी फसल 2. ग्रैष्मिकः खरीफ फसल 3. केदारः जायक फसल

राजकीय भूमि पर सीताध्यक्ष दासों, कर्मकारों और कैदियों की मदद से कृषिकार्य करवाता था। राज्य कुछ जमीन बटाई पर भी किसानों को देता था।

किसान अपनी उपज का 1/6 से 1/4 भाग तक भूमिकर राज्य को देते थे।चरागाह के साथ-साथ वन भी थे, जिनपर राज्य का अधिकार था। कृप्याध्यक्ष वन-संपत्ति की देखभाल करता था। अर्थशास्त्र में वनों की विभिन्न श्रेणियों का उल्लेख है।

पशुवन में जंगली जानवर रहते थे। मृगवन पालतू पशुओं के लिए था। दव्यवन में आर्थिक महत्व वाले लकड़ी, खान इत्यादि थे। हस्तिवन में हाथी पाए जाते थे जो युद्ध में काम आते थे।

उद्योग-धंधों की संस्थाओं को श्रेणी कहा जाता था। श्रेणियों के पृथक न्यायालय होते थे जो व्यापार-व्यवसाय से संबंधित विवादों का निपटारा करते थे।

श्रेण न्यायालय के प्रधान को महाश्रेष्ठि कहा जाता था। 1.श्रेणी: शिल्पियों का संगठन 2. निगम: व्यापारियों का संगठन 3. संघ: महाजनों व देनदारों का संगठन 4. सार्थवाहः अनाज से संबद्ध व्यापारियों का समह

व्यापार वाणिज्य-मेगास्थनीज के अनुसार एस्टिनोमोई नामक पदाधिकारी सड़क की देखभाल करते थे तथा दूरी निर्देशित करने के लिए 10 स्टेडिक की दूरी पर पत्थर स्थापित कर देते थे।

अर्थशास्त्र में चीनी रेशम का उल्लेख किया गया है। राज्य की तरफ से बाजार निर्धारित किए गए थे। निश्चित बाजारों में ही सामानों की खरीद-बिक्री हो सकती थी। नाप-तौल, बटखरे, बाजार तथा व्यापार पर नियंत्रण अनार्य रखता था।

मुद्रा-प्रणाली – मौर्यकाल तक मुद्रा का भी प्रचलन हो चुका था। लक्ष्णाध्यक्ष मुद्रा-व्यवस्था या राजकीय टकसाल का नियंत्रक था। मुद्रा के निर्माण एवं संचालन पर राज्य का एकाधिकार था।

इस समय के निश्चित सिक्के नहीं मिलते, जिन्हें प्रामाणिक तौर से मौर्य-शासकों का माना जा सके, सिक्के मौर्यकाल स्थलों से बड़ी संख्या में मिले है, जिनसे सिक्कों के प्रचलन की पुष्टि होती है।

अर्थशास्त्र से भी विस्तृत मुद्रा-प्रणाली की चर्चा की गई है। विभिन्न प्रकार के सिक्कों, सुवर्ण, कार्षापण, माषक, काकणी व अर्धकाकणी का उल्लेख मिलता है।

अर्थशास्त्र में वस्तुत: चांदी व तांबे के सिक्कों का ही उल्लेख है। चांदी के सिक्के 4 प्रकार (1. पण, 2.अर्द्धपण, 3.पाद, 4.अष्टभाग) के थे। तांबे के सिक्के (माशक, अर्द्धमाशक, काकणी व अर्द्धकाकणी) थे।

व्यापारिक मार्ग – मौर्य युग में 4 प्रमुख व्यापारिक मार्ग थे।

  • 1. पहला मार्गः पाटलिपुत्र से पुरूषपुर व ताम्रलिप्ति (तामलुक, प. बंगाल) तक। सबसे महत्वपूर्ण मार्ग जिसे उत्तरापथ कहा जाता है।
  • 2. दूसरा मार्ग: पश्चिम में पाटल से पूरब में कौशांबी के निकट उत्तरापथ से संबंद्ध था।
  • 3. तीसरा मार्ग: उत्तर में श्रावस्ती से दक्षिण में प्रतिष्ठान तक का मार्ग।
  • 4. चौथा मार्गः पश्चिमी तट भडौच (भृगुकच्छ) से मथुरा तक जिसके मार्ग में उज्जयिनी भी पड़ता था।

Maurya Samrajya के पतन के कारण

1. अयोग्य व निर्बल उत्तराधिकारी
2. प्रशासन का अतिशय केंद्रीयकरण
3. राष्ट्रीय चेतना का अभाव सांची का स्तूप कहां स्थित है
4. आर्थिक व सांस्कृतिक असमानताएं
5. प्रांतीय शासकों के अत्याचार
6. करों की अधिकता
अशोक द्वारा भेजे गये दूत
1. अन्तियोक……..सीरिया के राजा एंटीयोकस थियोस
2. तुरमय………….मिस्र के राजा टालमी फिलोडेलफस
3. अन्तिकिनी…………….मकदूनिया के राजा एंटिगोनस
4. मल ……………………………………सीरिन के राजा मगस
5. अलिकसुंदर………………एपिरस के राजा अलेक्जेंडर

1. सांची का स्तूप कहां पर स्थित है?

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप सांची बौद्ध स्तूपों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

2. मौर्य साम्राज्य का पतन का कारण क्या है?

1. अयोग्य व निर्बल उत्तराधिकारी
2. प्रशासन का अतिशय केंद्रीयकरण
3. राष्ट्रीय चेतना का अभाव सांची का स्तूप कहां स्थित है
4. आर्थिक व सांस्कृतिक असमानताएं
5. प्रांतीय शासकों के अत्याचार
6. करों की अधिकता

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