मौर्य साम्राज्य प्रशासन की सम्पूर्ण जानकारी



मौर्य साम्राज्य -प्रशासन की जानकारी मेगस्थनीज की इंडिका, कौटिल्य के अर्थशास्त्र व अशोक के अभिलेखों से मिलती है। मौर्य साम्राज्य (Mauryan Samrajya in Hindi) के प्रशासन के बारे सम्पूर्ण जानकारी।

मौर्य साम्राज्य राजकीय नियंत्रण
कौटिल्य ने राजा को सलाह दी है कि, जब वर्णाश्रम-धर्म (वर्गों और आश्रमों पर आधारित समाज-व्यवस्था) लुप्त होने लगे तो राजा को धर्म की स्थापना करनी चाहिए। कौटिल्य ने राजा को धर्मप्रवर्तक अर्थात् सामाजिक व्यवस्था का संचालक कहा है।

प्रमुख मौर्यकालीन अधिकारी
अधिकारी……………………………………कार्य
1. महामात्य…………………. प्रमुख अमात्य नगरों का अधिकारी
2. रूपदर्शक……………….सिक्कों का जाँचकर्ता (प्रधान अधिकारी)
3. अमात्य……………………योग्य अधिकारियों का समूह
4. अग्रामात्य ………………..प्रधानमंत्री का पद
5. प्रदेष्टा………………………मंडल का प्रमुख/प्रधान अधिकारी
6. ऐस्टिनोमोई …………….नगर का अधिकारी
7. रज्जुक…………………….साम्राज्य में न्याय व राजस्व का अधिकारी।
8. स्त्री महामात्र……………महिलाओं के नैतिक आचरण कोदेखने वाला अधिकारी।
9. सौवर्णिक………………..टकसाल का प्रमुख अधिकारी
10. अन्तः महामात्र ……..सीमावर्ती क्षेत्रों में धर्म प्रचार करने वालेअधिकारी।
11. धम्म महामात्र ……….समाज में सामंजस्य की स्थिति बनाए रखना।।
12. महामात्यापसर्प………गुप्तचर विभाग का प्रधान
13. युक्तक………..जिला में राजस्व वसूली का कार्य करने वाला अधिकारी।
Read More: Mauryan Dynasty : मौर्य साम्राज्य के बारे में कुछ रोचक तथ्य 

मौर्य-नौकरशाही: मौर्य साम्राज्य

अर्थशास्त्र में एक विस्तृत नौकरशाही का भी उल्लेख किया गया है। राज्य के विभिन्न विभागों की देखभाल के लिए अनेक पदाधिकारियों को नियुक्त किया गया था।

सबसे ऊंचे अधिकारियों को तीर्थ या महामात्र अथवा अमात्य कहा गया हैं इनकी संख्या 18 थी।

 इनमें प्रमुख मंत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, एसमाहर्ता (राजस्व की देखभाल करनेवाला), सन्निधाता(कोषाध्यक्ष), नायक (नगर-रक्षक), दंडपाल (पुलिस का प्रधान), दुर्गपाल (दुर्ग की रक्षा-व्यवस्था का प्रधान), अन्तपाल (सीमारक्षक) और व्यावहारिक (प्रधान न्यायाधीश) थे।

मौर्य-नौकरशाही एक पिरामिड के समान थी। सबसे शीर्ष पर मंत्री और उनके नीचे अन्य कर्मचारी थे।

सैन्य-संगठन: मौर्य साम्राज्य

चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल व स्थायी सेना का भी गठन किया।  प्रशासन की तरफ से सेना की देखभाल का उचित प्रबंध किया गया।

कौटिल्य व मेगास्थनीज, दोनों ही सैन्य-व्यवस्था का उल्लेख करते हैं। कौटिलय के अनुसार सेना चतुरंगिणी (पैदल, हाथी, घोड़ा और रथ) था।

सीमांतों की रक्षा के लिए मजबूत दुर्ग बनाए गए थे, जिनकी सुरक्षा दुर्गपाल और अंतपाल करते थे।

पुलिस एवं गुप्तचर: मौर्य साम्राज्य

आंतरिक सुरक्षा व अपराध तथा अपराधियों पर नियंत्रण रखने के लिए राज्य ने पुलिस और गुप्तचरों की भी व्यवस्था की।

नगर में शांति-सुव्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी नगराध्यक्ष की थी। दंडपाल पुलिस विभाग का प्रधान होता था।

गुप्तचरों की 2 श्रेणियां थीं। 1. संस्था या स्थायी गुप्तचर वे थे, जो एक स्थान पर संस्थाओं में गठित होकर कापटिकक्षात्र, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक और तापस के रूप में काम करते थे।

2. श्रेणी (संचार) में वैसे गुप्तचर थे, जो – भ्रमण कर सूचनाएं एकत्र करते थे। इस कार्य में स्त्रियों एवं वेश्याओं की भी सहायता ली जाती थी।

न्याय एवं दंड-व्यवस्था

न्याय-व्यवस्था का भी प्रधान राजा ही था, राज्य की तरफ से अनेक न्यायालय भी स्थापित किए गए थे। सबसे नीचे ग्राम-न्यायालय थे। छोटे झगडों को निचले स्तर पर ही निबटाने एवं अपराधियों को दंडित करने की व्यवस्था थी।

ग्राम-न्यायालयों के ऊपर संग्रहण, द्रोणसुख, स्थानीय और जनपद न्यायालय थे। सबसे ऊपर केंद्रीय न्यायालय था।

अर्थशास्त्र में विभिन्न स्रोतों का उल्लेख किया गया है, जिनसे राज्य को राजस्व की प्राप्ति होती थी। इसके अनुसार राज्य को मुख्यतः दुर्ग, राष्ट्र खनि, सेतु, वन, व्रज और वणिक पथ से आय प्राप्त होती थी।

दुर्ग से अनेक प्रकार के कर लिए जाते थे जैसे, चुंगी, जुर्माना, जेलखाना, शराब, वस्त्र-उद्योगों, वेश्या, कारीगर अचल संपत्ति पर कर इत्यादि।

राष्ट्र के अंतर्गत जनपद से होने वाली आय को रखा गया था। जैसे भूमिकर (1/6), बंदरगाहों, सड़कों चरागाहों से आय होती थी। खनिज पदार्थ एवं उनके कारखानों से प्राप्त होने वाली खनिज के अंतर्गत आती थी।

किसानों से सामान्यतः उपज का 1/4 या 1/6 भाग भूमि कर के रूप में लिया जाता था।

प्रांतीय व्यवस्था: Maurya Samrajya

प्रशासनिक सुविधा के लिए संपूर्ण मौर्य-साम्राज्य को विभिन्न इकाइयों में विभक्त किया गया था। सबसे बड़ी इकाई प्रांत थी। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में प्रांतों की निश्चित संख्या ज्ञात नहीं है।

स्थानीय शासन

प्रांतों को छोटी प्रशासनिक इकाइयों में विभक्त किया गया था। प्रांतों को जिला या स्थानीय में विभक्त किया गया था। जिला-प्रशासन का प्रधान स्थानिक होता था।

एक स्थानीय में 800 ग्रामों का समूह रहते थे। स्थानीय से छोटी प्रशासनिक इकाई द्रोणमुख थी। इसमें 400 गांवों को सम्मिलित किया गया था।

200 ग्रामों का समूह खर्वटिक कहलाता था तथा 100 गांवों को मिलाकर संग्रहण बनता था। शासन की सबसे छोटी इकाई गांव थी। इसका प्रशासन ग्रामिक के द्वारा होता था।

ग्रामिकों के कार्यों पर गोप नियंत्रण रखते थे। एक गोप की जिम्मेदारी 10 ग्राम थे। गोप व अन्य ग्राम-प्रशासन के अधिकारियों कार्यों की देखभाल में मदद करते थे।

नगर-प्रशासन

मौर्य-साम्राज्य की स्थापना तक भारत में अनेक नगरों की स्थापना हो चुकी थी।

हडप्पा के नगरों के पतन के पश्चात अनेक आर्थिक-सामाजिक और राजनीतिक कारणों से 6ठीं शताब्दी ई.पू. में पुनः नगरों के उदय व विकास ने अनेक नई समस्याओं को जन्म दिया।

अतः, इनके समाधान के लिए चन्द्रगुप्त मौर्य ने नगर-प्रशासन (म्युनिसिपल प्रशासन) की ओर ध्यान दिया।

मौर्य साम्राज्य का प्रशासनिक ढांचा

मौर्य साम्राज्य में प्रांतों को चक्र कहते थे। इन प्रांतों के अंतर्गत कई मंडलों का प्रशासनिक विभाजन किया जाता था। महामात्य नामक अधिकारी होते थे। मंडलों के अधिकारियों के नाम प्रादेशिक भी मिलते हैं।
राजधानियां ……………………………………मडल
1. तोसली……………………………………….समापा
2. पाटलिपुत्र……………………………………..कौशाम्बी
3. सुवर्णगिरि…………………………………….इसिला
4. सौराष्ट्र……………………………………….गिरिनार
प्रांतीय प्रशासन
1. प्रांतः ____प्रमुख अधिकारी कुमार या आर्यपुत्र
2. मंडल (कमिशनरी): ____प्रमुख अधिकारी प्रदेष्टा या प्रादेशिक
3. आहार या विषय (जिला): ____प्रमुख अधिकारी विषयपति या स्थानिक
4. स्थानीयः ____800 ग्रामों का समूह
5. दोणमुख: ____400 ग्रामों का समूह
6. खार्वटिक: ____200 ग्रामों का समूह
7. संग्रहण (10 ग्रामों का समूह): ____इसका प्रमुख अधिकारी गोप होता था।
8. ग्राम: ____प्रमुख अधिकारी ग्रामणी
Read More : Mauryan Empire Hindi : मौर्य वंश इतिहास से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी

चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक व्यवस्था

चन्द्रगुप्त के प्रशासन का प्रधान उद्देश्य इसे लोकहितकारी बनाना था। इस उद्देश्य से एक ओर विकास तथा आर्थिक हितों की सुरक्षा पर बल दिया गया तो दूसरी ओर शोषणात्मक एवं विघटनात्मक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर जनता का जीवन खुशहाल बनाने के कठोर नियम बनाए गए।

मौर्य केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था राजा पर आधारित थी। अर्थशास्त्र में राजस्व-संबंधी महत्वपूर्ण पहलुओं का वृहद विवेचना है इंडिका भी मौर्य शासक (चंद्रगुप्त) के व्यक्तिगत जीवन एवं उसके कार्यकलापों का उल्लेख करता है।राजा द्वारा लागू किए गए प्रशासनिक कानून) कानून के अन्य स्रोतों से (धर्म, व्यवहार और चरित्र) ऊपर था। 

परंपरागत राज्यशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार राजा सिर्फ धर्म (कानून) का पालन करने वाला (धर्मप्रवर्तक) कानून का निर्माता नहीं; परंतु कौटिल्य – राजा को कानून निर्माण-संबंधी अधिकार भी देता है।

कौटिल्य राजतंत्र का समर्थक थां वह राजा को स र्वशक्तिशाली अधिकार और राज्य का सबसे महत्वपूर्ण अंग (प्रकृति) मानता है। उसके अनुसार राजा या राज्य की उत्पत्ति समाज में फैली अव्यवस्था की स्थिति को समाप्त करने के लिए हुई थी।

मौर्यकालीन समाज

ब्राह्मणों (शिक्षकों, पुरोहितों, वेद का पाठ करने वालों, यज्ञ कराने वालों) को राज्य की ओर से करमुक्त भूमि दान में दी जाती थी, जिसे ब्रह्मदेव कहा जाता था।

मौर्ययुग में ही नई स्थापित बस्तियों में शूद्रों को प्रथम बार भूमि भी दी गई। शूद्रों की स्थिति में परिवर्तन का प्रमाण इस बात से भी लगता है कि अर्थशास्त्र में शूद को आर्य कहा गया है और उसे म्लेच्छ से भिन्न माना गया।

अर्थशास्त्र में 15 मिरित जातियों का भी उल्लेख हुआ हैं इन्हें अंतवासिन – कहा गया है। इनकी उत्पत्ति अनुलोम व प्रतिलोम विवाहों के कारण हुई थी।

दास-प्रथा

मेगस्थनीज और अन्य यूनानी लेखकों (डायोडोरस, एरियन, स्ट्रेबो) की ‘धारणा थी कि मौर्यकालीन भारतीय समाज में दास-प्रथा प्रचलित नहीं थी।

मेगास्थनीज के अनुसार भारत में सभी स्वतंत्र और समान है। उनमें कोई भी दास नहीं है। डायोडोरस भी मानता है कि कानून के अनुसार कोई किसी को दास नहीं बना सकता है।

अर्थशास्त्र में दासों की विभिन्न श्रेणियों का वर्णन है। स्त्री दासों के रूप में धातू, उपचारिका व परिचारिका का उल्लेख कौटिल्य ने किया है। स्त्री दासों की एक श्रेणी बंधकों भी थी।

मेगस्थनीज के अनुसार भारत में दास नहीं थे। परंतु कौटिल्य ने 9 प्रकार के दासों का वर्णन किया है।
1. ध्वजाहत…………………युद्ध में जीता हुआ दास
2. उदर दास………………पेट का दास
3. गृहजात………..घर में दासी द्वारा उत्पन्न दास
4. दायागत………पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त दास
5. लब्ध …………दान में प्राप्त हुआ दास
6. क्रीत…………क्रय किया हुआ दास
7. आत्मविक्रयी……….स्वयं को बेचने वाला दास
8. अहितक………….ऋण के बदले धरोहर के रूप में रखा गया दाम
9. दंडप्रणीत……………..दण्ड के परिणाम स्वरूप बनाया गया दान

स्त्रियों की दशा

मौर्यकाल में पारिवारिक व सामाजिक जीवन सुख-शांति का था। संयुक्त परिवार की प्रथा ज्यादातर प्रचलित थी। विवाह की संस्था पूर्णरूपेण स्थापित हो चुकी थी। अधिकांश विवाह एकात्मक ही होते थे, यद्यपि बहु-विवाह के भी उदाहरण मिलते हैं।

र्थशास्त्र में 8 प्रकार के विवाहों (1.ब्रह्म, 2.दैव, 3. आर्य, 4.प्रजापत्य, 5.असुर, 6.गांधर्व, 7.राक्षस, 8.पैशाच) का उल्लेख किया गया है। प्रथम 4 प्रकार के विवाह धर्मसंगत माने जाते थे और अंतिम 4 अधार्मिक वर्णविशेष के अनुसार विवाह किए जाते थे। नियोग का भी प्रचलन था, परंतु अर्थशास्त्र में सती-प्रथा का मलेच्छ उल्लेख नहीं मिलता (यूनानी लेखक भारत के उत्तर-पश्चिम में योद्धाओं की पत्नियों के सती होने का उल्लेख करते हैं।)

अर्थशास्त्र में सती प्रथा के प्रचलित होने का प्रमाण नहीं मिलता, किंतु यूनानी लेखकों ने उत्तर-पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है। मौर्य युग में गणिका या वेश्याओं का भी उल्लेख मिलता है। स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियां रूपाजीवा कहलाती थीं। इनसे राज्य को राजस्व प्राप्त होती थी। अनेक स्त्रियां रूपाजीवा (वेश्या) भी होती थीं। स्त्रियों से गुप्तचरी का काम भी लिया जाता था।

Leave a Comment