Humayun History in hindi (1530-1540 ई. व 1555-1556 ई.): हुमायूँ का सम्पूर्ण इतिहास



हुमायूँ (1530-1540 ई. व 1555-1556 ई.) बाबर (Babur) के 4 पुत्रों (1. हुमायूं, 2. कामरान, 3. असकरी, 4. हिंदाल) में हुमायूं सबसे बड़ा था। एकमात्र शासक जिसने अपने भाइयों में साम्राज्य का विभाजन किया। पिता के इच्छानुसार असकरी को सम्भल, हिंदाल को अलवर तथा कामरान को काबुल और कंधार का प्रांत दिया।

हुमायूँ (1530-1540 ई. व 1555-1556 ई.) – Humayun History in hindi

Humayun History in hindi
हुमायूँ (1530-1540 ई. व 1555-1556 ई.) का जीवन परिचय – Humayun History in hindi

30 दिसंबर,1530 को बिना किसी अवरोध के आगरा में मुग़ल बादशाह (Mughal emperor ) हुमायूं का राज्याभिषेक हुआ। हुमायूँ ने दिल्ली के निकट दीन पनाह’-Din-Panah नगर की स्थापना की थी।

हुमायूँ का जीवन परिचय – Biography of Humayun

मूलनाम नासिरूद्दीन मुहम्मद
जन्म/स्थल (Birth/Place)6 मार्च, 1508 ई. को काबुल में।
माता (Mother)माहम बेगम
पिता (Father)बाबर
जीवनसाथी (Partner)1. हमीदा बानु बेगम
2. बेगा बेगम
3. बिगेह बेगम
4. चाँद बीबी
5. हाजी बेगम
6. माह-चूचक
7. मिवेह-जान
8. शहज़ादी खानम
पुस्तक (Book)हुमायूँनामा’- हुमायूँ की सौतेली बहन गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा’ लिखी।
राज्याभिषेक30 दिसंबर, 1530 ई. को आगरा में सम्पन्न।
उपहार (Gift)बाबर ने आगरा विजय के पश्चात पर्याप्त धन व कोहिनूर हीरा भेंट किया तथा संभल की जागीर प्रदान किया।

हुमायूँ द्वारा लड़े गये प्रमुख युद्ध- Major wars fought by Humayun

1. कालिंजर पर आक्रमण (1531 ई.) – प्रथम सैनिक अभियान बुंदेलखण्ड में स्थित कालिंजर के विरूद्ध था। कालिंजर के शासक प्रताप रूद्र देव पर आक्रमण किया परंतु असफल रहा।

2. दोहरिया का युद्ध (1532ई.) अफगानी शासक महमूद लोदी से प्रथम मुकाबला, गोमती नदी के तट पर स्थित दोहरिया नामक स्थल पर महमूद लोदी पराजित हुआ।

3. चुनार का घेरा (1532ई.) – बनारस के निकट चुनार पर अधिकार किया। यह पूर्वी भारत के द्वार के रूप में विख्यात था।

4. बहादुरशाह से संघर्ष (1535-36ई.) हुमायूँ ने गुजरात के शासक माण्डू और चम्पानेर के दुर्ग को जीता। बहादुरशाह ने तुर्की तोपची रूमी खां की सहायता से तोपखाना तैयार किया था।

Battle of Chausa (June 26, 1539 AD)
Battle of Chausa (June 26, 1539 AD)

5. चौसा का युद्ध (26 जून, 1539ई.) यह युद्ध हुमायूँ और शेर खां के मध्य चौसा नामक स्थल पर हुआ। चौसा कर्मनाशा नदी पर स्थित था। इस युद्ध में हुमायूँ पराजित हुआ। युद्ध जीतने के बाद शेरखां ने शेरशाह की उपाधि धारणकर ली। इस युद्ध में हुमायूँ बड़ी मुश्किल से निजाम नामक एक भिश्ती की सहायता से गंगा पार कर सका।

6. कन्नौज/ बिलग्राम का युद्ध (17 मई, 1540ई.) इस युद्ध में शेरशाह ने हुमायूँ को पराजित कर आगरा और दिल्ली पर अधिकार कर लिया और हुमायूँ भारत छोड़कर सिन्ध चला गया। इस आधार पर हुमायूँ का शासन काल 2 चरणों में विभक्त है।

प्रथम चरण :1530-1540 ई. — द्वितीय चरण : 1555 – 1556 ई.

अपने निर्वासन काल के दौरान हुमायूँ आरम्भ में अमरकोट के राणा वीरसाल के यहाँ तथा अन्ततः ईरान के शाह के यहाँ जीवन व्यतीत किये थे। उसने ईरान के शाह तथा बैरम खाँ की मदद से 1555 ई. में पुनः सिंहासन प्राप्त किया।

द्वितीय अफगान राज्य- Second Afghan State

सूर वंश (1540 – 1555 ई.) बिलग्राम के युद्ध ने हुमायूँ के भाग्य का अंत कर दिया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप भारत मे मुगलों की सत्ता समाप्ति की स्थिति में पहुंच गई तथा द्वितीय अफगान राज्य (प्रथम अफगान साम्राज्य लोदी वंश- Lodi Dynasty था।) का मार्ग प्रशस्त हुआ जिसका संस्थापक शेरशाह सूरी था।

शेरशाह सूरी (शेर खाँ) (1540-45 ई.) – Sher Shah Suri History

Sher Shah Suri History
शेरशाह सूरी (शेर खाँ) – Sher Shah Suri History

शेरशाह सूरी (शेर खाँ) -Sher Shah Suri (Sher Khan) (1540-45 AD) 1497 से 1518 ई. तक निरंतर 21 वर्ष तक फरीद (शेरशाह) ने अपने पिता की जागीर की देखभाल की और शासन का अनुभव प्राप्त किया। बहार खां लोहानी ने फरीद द्वारा शेर को मारने के उपरांत में शेर खां की उपाधि दी थी।

शेर खां ने हजरत-ए-आला की उपाधि ग्रहण की और दक्षिण बिहार का वास्तविक शासन बना। 1530 ई. में शेरशाह ने चुनार के किलेदार ताज खां की विधवा पत्नी लाड मलिका से विवाह कर चुनार के किले पर अधिकार प्राप्त किया। 1539 ई. में चौसा के युद्ध में हुमायू को पराजित करने के बाद शेर खां ने शेरशाह की उपाधि ग्रहण किया। 22 मई 1545 ई. को कालिंजर पर आक्रमण के समय, तोपखाना फट जाने से शेरशाह की मृत्यु हो गई।

सड़कें व सराय-Streets and Taverns

बंगाल में सोनारगांव से आगरा, दिल्ली होते हुए लाहौर व पेशावर तक यह मार्ग सड़क-ए-आजम कहलाती थी। इसे शेरशाह सूरी मार्ग भी कहा जाता था। इसे ब्रिटिश गर्वनर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड ने ग्रांड टंक रोड (G.T. Road) का नाम दिया।

4 मुख्य सड़के 1. सोनारगांव (बंगाल) से पेशावर (पाकिस्तान) तक, 2. आगरा से बुरहानपुर तक, 3. आगरा से चितौड़ तक, 4. लाहौर से मुल्तान तक।  शेरशाह ने रोहतासगढ़ किला, दिल्ली का पुराना किला (दीनपनाह को तोड़कर) एवं उसके अदर किला-ए-कहना, सासाराम (बिहार) में स्वयं का मकबरा बनवाया।

कन्नौज नगर को पुर्ननिर्मित कर शेरसूर नगर बसाया और पाटलिपुत्र को पटना के नाम से पुनः स्थापित किया। मलिक मुहम्मद जायसी शेरशाह सूरी के समय के प्रसिद्ध कवि थे। उन्होंने अनेक काव्यों पद्मावत, अखरावट व आखिरी कलाम की रचना की थी।

शेरशाह के उत्तराधिकारी – Sher Shah’s Successor

इस्लामशाह (सलीम) (1545-53 ई.)

मई, 1545 में शेरशाह की मृत्यु के पश्चात उसके उत्तराधिकारी का प्रश्न उठ खड़ा हुआ। शेरशाह ने अपनी मृत्यु के पूर्व ही अपने ज्येष्ठ पुत्र आदिल खां को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था। शेरशाह की मृत्यु के समय वह रणथंभौर में था। शेरशाह का दूसरा पुत्र जलाल खां, जिसने शेरशाह के साथ अनेक सैनिक अभियानों में भाग लिया था (चुनार, गौड़, तेलियागढ़ी, चौसा, कन्नौज, रायसीन), कालिंजर के घेरे के समय रीवा पर अधिकार करने में व्यस्त था।

शेरशाह की मृत्यु के साथ ही अफगान सरदार उत्तराधिकार के मामले में सक्रिय हो उठे। 1527 मई, 1545 को जलाल खां कालिंजर पहुंचा। वहीं पर उसी दिन अफगान सरदारों ने उसे सुल्तान घोषित कर दिया। उसका विधिवत राज्याभिषेक हुआ और वह इस्लामशाह के नाम से गद्दी पर बैठा।

15 नवंबर, 1553 ई. को इस्लामशाह की मृत्यु हो गयी। उसके शव को सार (बिहार) लाया गया तथा उसके पिता के मकबरे के निकट दफनाया .

फिरोज शाह (1553 ई.)

इस्लामशाह की मृत्यु के बाद अफगान अमीरों ने मृत सुल्तान के नाबालिग (17 वर्ष) पुत्र फिरोज को सुल्तान घोषित कर दिया। उसका राज्याभिषेक ग्वालियर में हुआ। केवल 3 दिनों का बादशाह बन सका। मुबारिज खां ने अल्पवयस्क सुल्तान की हत्या कर दी और स्वयं ही मुहम्मदशाह आदिल के नाम से सुल्तान बन बैठा।

मुहम्मद आदिल शाह (1553-57ई.)

फिरोज शाह की हत्या कर मुबारिज खां ने सुल्तान मुहम्मद आदिल शाह की पदवी धारण कर गद्दी पर बैठा। किंतु वह अयोग्य और दुराचारी था, इसी कारण अदाली अर्थात मूर्ख के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उसने हेमू नामक एक बनिया को अपने प्रशासन का संपूर्णभार सौंप दिया था। आदिल शाह की अयोग्यता के कारण साम्राज्य में चारों ओर विद्रोह होने लगा। उसका चचेरा भाई इब्राहिम शाह ने विद्रोह कर दिल्ली व आगरा पर अधिकार कर लिया। पंजाब में शेरशाह के भतीजे शाहजादा अहमद खां ने विद्रोह किया तथा सिकंदर शाह सूर की पदवी धारण कर 1200 घुड़सवारों के साथ आगरा की ओर प्रस्थान किया।

ब्राहिम शाह ने उसका मुकाबला किया किंतु पराजित हुआ और संभल की ओर भाग गया। इस प्रकार दिल्ली और आगरा पर सिकंदर शाह सूर का अधिकार हो गया। 22 जून, 1555 ई. को सरहिंद नामक स्थल पर दोनों के मध्य युद्ध हुआ। सिकंदर शाह पराजित हुआ और शिवालिक की पहाड़ियों में शरण लिया। वहा पुनः वह बंगाल गया और वहीं उसकी मृत्यु हो गयी।

द्वितीय चरण : 1555 – 1556 ई. – Humayun History in hindi

हुमायूँ द्वारा पुनः राज्य की प्राप्ति-Re-acquisition of the kingdom by Humayun

1545 ई. में हुमायूँ ने कंधार व काबुल पर अधिकार कर लिया। शेरशाह के पुत्र इस्लामशाह की मृत्यु के बाद हुमायूँ को हिन्दुस्तान पर अधिकार का पुनः अवसर मिला। 5 सितंबर, 1554 ई. में हमायूँ अपनी सेना के साथ पेशावर पहुंचा। फरवरी, 1555 ई. को उसने लाहौर पर नियंत्रण कर लिया।

मच्छीवार का युद्ध (15 मई, 1555 ई.): लुधियाना में लगभग 19 मील पूर्व में सतलज नदी के किनारे स्थित मच्छीवार स्थल पर हुमायूँ एवं अफगान सरदार। नसीब खां एवं तातार खां के बीच संघर्ष हुआ। युद्ध का परिणाम हुमायूँ के पक्ष में रहा। सम्पूर्ण पंजाब मुगलों के अधिकार में आ गया।

सरहिन्द का युद्ध (22 जून, 1555 ई.): इस संघर्ष में अफगान सेना का नेतृत्व सुलतान सिकन्दर सूर एवं मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खां ने किया परंतु अफगान पराजित हुए। अबुल फजल ने हुमायूं को इन्सान-ए-कामिल कहकर संबोधित किया था।

हुमायूँ के निर्माण कार्य – Humayun’s Construction Work

कानून-ए-हुमायूं के अनुसार प्रशासन में सहायता के लिए अहल-ए-मुराद वर्ग का गठन किया जिसमें नर्तक व नर्तकियां शामिल थी। उसने दिल्ली में मीनाबाजार की शुरूआत की थी इसमें कर्मचारियों की पत्नियां बाजार लगाती थी जबकि राजपरिवार के लोग क्रय करते थे।

ज्योतिष में चूँकि हुमायूँ विश्वास करता था, इसलिए उसने सप्ताह के सातों दिन 7 रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाये। वह मुख्यतः इतवार को पीला, शनिवार को काला एवं सोमवार को सफेद कपड़े पहनता था।

हुमायूँ की मृत्यु – Death of Humayun

1556 ई. में दिल्ली में ‘शेरमण्डल’ नामक पुस्तकालय की सीढ़ियों से लुढ़ककर गिरने से हुमायूँ की मृत्यु हो गयी। अकबर ने हुमायूं का मकबरा दिल्ली में बनवाया (हुमायूँ के मकबरे में सर्वप्रथम संगमरमर का प्रयोग हुआ)।

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1. हुमायूँ का पूरा नाम क्या था ? (What was the full name of Humayun?)

जवाब: नासिरूद्दीन मुहम्मद हुमायूँ

2. किस युद्ध को जीतने के बाद शेर खां ने शेरशाह की उपाधि धारण की ?

जवाब: चौसा युद्ध (Battle of Chausa (June 26, 1539 AD) में हुमायूँ और शेर खां के मध्य चौसा नामक स्थल पर हुआ। इस युद्ध में हुमायूँ पराजित हुआ। युद्ध जीतने के बाद शेरखां ने शेरशाह की उपाधि धारणकर ली।

3. हुमांयुनामा किसने लिखी थी ? (Who wrote Humayunama?)

जवाब: हुमायूँ की सौतेली बहन गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा’ लिखी।

4. हुमायूँ की मृत्यु कैसे हुई थी? (How did Humayun died?)

जवाब: ‘शेरमण्डल’ नामक पुस्तकालय की सीढ़ियों से लुढ़ककर गिरने से हुमायूँ की मृत्यु हो गयी।

5. दिल्ली में मीनाबाजार की शुरूआत किस मुग़ल साशक ने की थी?

जवाब: हुमायूँ

6. शेर शाह सूरी का मकबरा कहा स्थित है? (Where is the tomb of Sher Shah Suri located?)

जवाब: शेरशाह सूरी का मकबरा बिहार के सासाराम में स्थित है। यह मकबरा भारत-इस्लामी वास्तुकला का एक उदाहरण है, इसे वास्तुकार मीर मुहम्मद अलीवाल खान द्वारा डिजाइन किया गया था और 1540 और 1545 के बीच बनाया गया था, यह लाल बलुआ पत्थर मकबरा (122 फीट ऊंचा) है, जो एक कृत्रिम झील के बीच में खड़ा है।

7. शेरशाह सूरी मार्ग को किस ब्रिटिश गर्वनर जनरल ग्रांड टंक रोड (G.T. Road) का नाम दिया ?

जवाब: ब्रिटिश गर्वनर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड ने ग्रांड टंक रोड (G.T. Road) का नाम दिया।

8. दीन पनाह’-Din-Panah नगर की स्थापना किसने की थी?

जवाब: हुमायूँ

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