गुलाम वंश (1206 ई.-1290 ई.) Gulam Vansh के प्रमुख शासक



गुलाम वंश (Gulam Vansh) नाम दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाले सुल्तान 3 अलग-अलग वंशों के कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतबी, इल्तुतमिश ने शम्सी और बलबन ने बलबनी वंश की स्थापना की थी। आरंभ में इसे दास वंश का नाम दिया गया क्योंकि इस वंश का प्रथम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक दास था। गुलाम वंश

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Slave Dynasty : Gulam Vansh
Gulam Vansh:1206 ई.-1290 ई.

गुलाम वंश (Gulam Vansh) के प्रमुख शासक

S.Nशासकशासन काल
1.कुतुबुद्दीन ऐबक(1206 – 1210 ई.)
2.आरामशाह (1210 ई.)
3.इल्तुतमिश (1210 – 1236 ई.)
4.रूकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह(1236 ई.)
5.रजिया सुल्तन (1236 – 1240 ई.)
6.मुईज़ुद्दीन बहरामशाह(1240 – 1242 ई.)
7.अलाऊद्दीन मसूदशाह (1242 – 1246 ई.)
8.नासिरूद्दीन महमूद (1246 – 1266 ई.)
9.घियासुद्दीन बलबन(1266 – 1286 ई.)
10.कैकुबाद (1286-1290 ई.)
11.क्यूमर्श (1290 ई.)

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206 – 1210 ई.)

मुईजुद्दीन मुहम्मद गोरी के गुलामों में सबसे योग्य और विश्वसनीय कुतुबुद्दीन ऐबक था। कुतुबुद्दीन ऐबक तुर्क जनजाति का था। ऐबक का अर्थचन्द्रमा का देवता होता है। वह तुर्किस्तान का रहनेवाला था। बचपन में ही दास के रूप में वह नशापुर के बाजार में लाया गया। वहां उसे काजी फखरूद्दीन अब्दुल अजीज कफी ने खरीद लिया काजी ने उसकी उचित ढंग से देखभाल की तथा उसे धनुर्विद्या और घुड़सवारी की शिक्षा दी।

ऐबक ने कुरान पढ़ना भी सीख लिया और इसीलिए वह कुरान खां (कुरान का पाइ करने वाला) के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। बाद में वह नैशापुर से गजनी ले जा कर बेच दिया गया उसे मुहम्मद गोरी ने खरीद लिया। मुहम्मद गोरी को सेवा में आने के बाद कुतुबुद्दीन के जीवन में महान परिवर्तन आया। गोरी ने उसे अमीर-ए-आखूर (शाही घुड़साल का अधिकारी) के पद पर प्रोन्नत कर दिया।

1205 ई. में खोखरों के विरूद्ध मुहम्मद गोरी का साथ दिया। वस्तुत गोरी की सैनिक योजनाओं को मूर्तरूप ऐबक ने ही दिया। इसलिए भारतीय तुर्क अधिकारी से ही अपना प्रधान मानने लगे थे, क्योंकि गोरी सदैव ही मध्य एशिया की राजनीति में उलझा रहा।

ऐबक का राज्याभिषेक 25 जून, 1206 को लाहौर में हुआ, लाहौर ही उसकी राजधानी थी तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद गोरी ने ऐबक को विजित प्रदेशों का प्रबंधक नियुक्त किया। इन क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ऐबक ने दिल्ली के निकट इन्द्रप्रस्थ को अपना मुख्यालय बनाया। आरंभ में ऐबक की स्थिति केवल मलिक एवं सिपहसालार का पद रहा।

1208 ई. में गोरी के भीतीजे गयासुद्दीन महमूद ने ऐबक को दास मुक्ति पत्र देकर उसे सुल्तान की उपाधि प्रदान की थी। ऐबक को भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक माना जाता है। अपनी दानशीलता के कारण वह लाख बख्श (लाखों का दान करने वाला) व पील बख्श (हाथियों का दान देने वाला) के नाम से विख्यात था। हसन निजामी और फर्रुखमबीर उसके दरबार के प्रसिद्ध विद्वान थे।

इसने कुतुबमीनार का निर्माण कार्य प्रारम्भ करवाया। कुतुबमीनार का नाम प्रसिद्ध सूफी सन्त ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम पर रखा गया। इसने भारत की प्रथम मस्जिद कुव्वत-उल-इस्लाम दिल्ली (पृथ्वीराज-III के किले रायपिथौरागढ़ के स्थान पर निर्मित) दिल्ली में है जबकि अढाई दिन काझोंपडा (विग्रहराज विसलदेव-IV के द्वारा निर्मित संस्कृत महाविद्यालय के स्थान पर) अजमेर में बनवाया था।

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का ध्वस्त करने वाला ऐबक का सहायक सेनानायक बख्तियार खिलजी था। इसकी मृत्यु लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते हुए घोड़े से गिरकर हुई थी। ऐबक का मकबरा लाहौर में है।

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आरामशाह (1210 ई.)

ऐबक की अकस्मात मृत्यु के कारण उसके उत्तराधिकारी के चुनाव की समस्या को तुर्की सरदारों ने स्वयं हल किया। कुछ तुर्की सरदारों ने आरामशाह को लाहौर में (1210 ई.) सुल्तान घोषित कर दिया। आरामशाह एक अक्षम और आरामतलब व्यक्ति था। अनेक तुर्क सरदारों ने उसका विरोध किया।

दिल्ली के तुर्क सरकारों ने बदायूं के गवर्नर इल्तुतमिश, जो ऐबक का विश्वासपात्र गुलाम एवं उसका दामाद भी था। इसको दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा, इल्तुतमिश शीघ्र ही दिल्ली पहुंच गया। आरामशाह भी उसके दिल्ली-आगमन की सूचना पाकर दिल्ली तक आ पहुंचा, परंतु इल्तुतमिश ने उसे पराजित कर मार डाला और स्वंय सुल्तान बन बैठा।

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1210 – 1236 ई.)

इल्तुतमिश का अर्थ साम्राज्य का स्वामी है। इल्तुतमिश या अलमश इल्बरी तुर्क था। उसका पिता ईलाम खां इल्बरी जनजाति का सरदार था। इल्तुतमिश शम्शी वंश का था इसलिए नये वंश का नाम शम्शी वंश पड़ा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इल्तुतमिश को खरीदने की इच्छा प्रकट की तो सुल्तान ने दासों के व्यापारी को आज्ञा दी कि वह इल्तुतमिश को दिल्ली ले जाए। दिल्ली मे ही कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे अपने दास के रूप में खरीदा।

दिल्ली में इल्तुतमिश शीर्घ ही कुतुबुद्दीन ऐबक का विश्वासपात्र बन गया। उसे सरजानदार (शाही अंगरक्षकों को सरदार) नियुक्त किया गया। इल्तुतमिश की प्रशासनिक क्षमता से प्रभावितहो कर कतुबुद्दीन ने उसे अन्य प्रशासनिक पद भी सौंपे। उसे अमीर-ए-शिकार का पद दिया गया।

1205 ई. में इल्तुतमिश को ऐबक ने दासता से मुक्त कर दिया। इसके बाद उसे बदायूं का प्रशासक नियुक्त किया गया। ऐबक ने अपनी एक पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। भारत में तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक इल्तुतमिश ही था। भारत में सहारा मुस्लिम प्रभुसत्ता का वास्तविक शुभारंभ इल्तुतमिश से ही होता है।

इसने कुतुबमीनार को बनवाकर पूरा किया और राज्य को सदढ़ व स्थिर कर हुई बनाया। इल्तुतमिश ने इक्ता व्यवस्था शुरू की थी। इसके अंतर्गत सभी सैनिकों व गैर-सैनिक अधिकारियों को नकद वेतन के बदले भूमि प्रदान की जाती थी। इक्ता एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ भूमि है। यह भूमि इक्ता तथा इसे लेने वाले इक्तादार‘ कहलाते थे।

इल्तुतमिश ने चाँदी के ‘टका’ तथा ताँबे के जीतल’ का प्रचलन किया एवं दिल्ली में टकसाल स्थापित किये थे। टको पर टकसाल का नाम लिखने की परंपरा भारत में प्रचलित करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है। सिक्कों पर शिव की नंदी व चौहान घुड़सवार अंकित होते थे।

वह दिल्ली का प्रथम शासक था जिसने सुल्तान उपाधि धारण कर स्वतन्त्र सल्तनत (18 फरवरी,1229 ई.) को स्थापित किया। उसने बगदाद के खलीफा (अल मुंत सिर बिल्लाह) से मान्यता प्राप्त की। और ऐसा करने वाला वह प्रथम मुस्लिम शासक बना। उसने 40 योग्य तुर्क सरदारों के एक दल चालीसा (चहलगानी) का गठन किया जिसने इल्तुतमिश की सफलताओं में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

1221 ई. में चंगेज खाँ के नेतृत्व में मंगोल सेना, ख्वारिज्म के राजकुमार जलालुद्दीन मंगबारानी का पीछा करते हुए दिल्ली की सीमा तक आ पहुंची थी। लेकिन इल्तुतमिश ने मंगबारानी को शरण देने से मना करके चतुराईपूर्वक दिल्ली को मंगोलों के आक्रमण से बचा लिया।

इल्तुतमिश को भारत में ‘गुम्बद निर्माण का पिता’ कहा जाता है। उसने सुल्तानगढ़ी मकबरा अपने पुत्र नासिरूद्दीन की कब्र पर निर्मित करवाया। यह भारत का प्रथम मकबरा था, इसको स्थापित करने का श्रेय इल्तुतमिश को जाता है।

मुहम्मद गोरी के नाम पर मदरसा-ए-मइज्जी दिल्ली में बनवाया। उज्जैन का महाकाल मंदिर को ध्वस्त किया। दिल्ली को राजधानी बनाने वाला प्रथम सुल्तान इल्तुतमिश ही था। 30 अप्रैल, 1236 ई. को इसकी मृत्यु हो गयी। इसके शासनकाल में न्याय चाहने वाला व्यक्ति लाल वस्त्र धारण करता था।

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न्यायप्रिय शासकः इल्तुतमिश

इल्तुतमिश एक न्यायप्रिय शासक था इब्नबतूता के अनुसार उसने अपने महल के सामने संगमरमर की 2 शेरों की मूर्तियां स्थापित करायी थी जिनके गले में घंटियां लटकी हुयी थी जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति न्याय मांग सकता था। रणथम्भौर जीतने वाला प्रथम शासक इल्तुतमिश था। शुद्ध अरबी सिक्के चलाने वाला प्रथम तुर्क सल्तान इल्तुतमिश था। इल्तुतमिश ने सिक्कों पर टकसाल का नाम लिखने की परम्परा प्रारंभ किया था।

ग्वालियर विजय के इल्तुतमिश ने सिक्को पर रजिया का नाम भी लिखवाया था। इल्तुतमिश ने मोहम्मद मोरी की स्मृति में मदरसा-ए-मुइज्जी व अपने पुत्र की स्मृति में नासिरीमदरसा बनवाया था।

रूकुनुद्दीन फिरोजशाह (1236 ई.)

इल्तुतमिश ने अपनी मृत्यु के पूर्व अपना राज्य अपनी पुत्री रजिया को सौंपने की इच्छा व्यक्त की थी। इसका कारण यह था कि उसके योग्य और बड़े पुत्र, लखनौती के शासक, नासिरूद्दीन महमूद की मृत्यु हो चुकी थी तथा छोटा पुत्र रूकुनुद्दीन फिरोजशाह एक दुर्बल और अक्षम व्यक्ति था।

दुर्भाग्यवश इल्तुतमिश की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकेगी। तुर्क अमीर एक स्त्री को राज्य करते हुए देखना अपना अपमान समझते थे। अतः अनेक तुर्क अमीरों, फिरोजशाह की माता (शाहतुर्कन) और अनेक अक्तादारों ने षड्यंत्र कर रूकुनुद्दीन फिरोजशाह को 1236 ई. में सुल्तान घोषित कर दिया।

फिरोजशाह सुल्तान तो बन गया, परंतु वह राज्य पर नियंत्रण नहीं रख सका। वास्तविक सत्ता शाहतुर्कन के हाथों चली गई। वह एक क्रूर महिला थी। इल्तुतमिश के छोटे पुत्र कुतुबुद्दीन को अंधा करवाकर उसकी हत्या करवा दी गई। प्रशासन पर नियंत्रण ढीला पड़ गया। जनता पर भी अत्याचार होने लगे।

 दिल्ली में सुल्तान की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर रजिया लाल वस्त्र पहनकर (न्याय की मांग का प्रतीक) नमाज के अवसर पर जनता के सम्मुख उपस्थित हुई। उसने शाहतुर्कन के अत्याचारों एवं, राज्य में फैली अव्यवस्था का वर्णन किया तथा आश्वासन दिया कि शासक बनकर वह शांति एवं सुव्यवस्था स्थापित करूंगी। रजिया से तुर्क अमीर और अन्य व्यक्ति प्रभावित हो उठे।

जनता ने आक्रमण कर शाहतुर्कन को गिरफ्तार कर लिया एवं रजिया को सुल्तान घोषित कर दिया। फिरोजशाह जब विद्रोहियों से भयभीत होकर दिल्ली पहुंचा तब उसे भी कैद कर लिया गया और उसकी हत्या कर दी गई। नवंबर, 1236 ई. में रजिया सुल्तान के पद पर प्रतिष्ठित हो गई।

रजिया सुल्तान (1236 ई.-1240 ई)

रजिया दिल्ली की प्रथम व अन्तिम मुस्लिम महिला शासक थी। रजिया ने सैनिक वेशभूषा धारण की, पर्दा प्रथा छोड़कर पुरूष वेशभूषा कुबा (कोट) व कुलाहा (टोपी) पहनकर दरबार में बैठती थी। और हाथी पर चढ़कर जनता के बीच जाना शुरू कर दिया।

रजिया घोड़े पर सवार होकर युद्ध के मैदान में जाती थी। सिंहासन पर बैठते ही रजिया ने कूटनीति से काम लिया और अमीर वर्ग में फूट डाल दी थी। रजिया ने अबीसिनिया निवासी एक गुलाम मलिक जलालुद्दीन याकूत को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया और उसे ‘अमीर-ए-आखुर’ अर्थात अश्वशाला प्रधान के पद पर नियुक्त कर दिया। इससे अमीर वर्ग (तुर्की अधिकारी) नाराज हो गए थे।

भटिण्डा के सूबेदार अल्तूनिया ने विद्रोह कर याकूत की हत्या कर दी तथा रजिया को बन्दी बना लिया। रजिया ने कूटनीतिक दृष्टिकोण से अल्तूनिया से शादी कर ली। इसी बीच इल्तुतमिश के एक पुत्र बहरामशाह ने सत्ता हथिया ली तथा भटिण्डा से दिल्ली आते समय अल्तूनिया व रजिया को हराकर उनका वध 13 अक्टूबर, 1240 को कर दिया।

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मुईजुद्दीन बहरामशाह (1240-42 ई.)

रजिया के पश्चात 1240 ई. में बहरामशाह सुल्तान बना, परंतु वह कुछ वर्षों तक ही गद्दी पर रह सका। वह नाममात्र का सल्तान था। राज्य की वास्तविक शक्ति का संचालन चालीस गुलामों का दल ही करता था। शासक पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए तुर्की अमीरों ने नायब-ए-मुमलकत (संरक्षक) का पद बनाया और उस पर एतगीन को बहाल किया गया, परंतु उसकी बढ़ती से आशंकित होकर बहरामशाह ने उसकी हत्या करवा डाली।

रजिया ने अबीसिनिया निवासी एक गुलाम मलिक जलालुद्दीन याकूत को आवश्यकता से अधिक महत्त्व दिया और उसे ‘अमीर-ए-आखुर’ अर्थात अश्वशाला प्रधान के पद पर नियुक्त कर दिया। इससे अमीर वर्ग (तुर्की अधिकारी) नाराज हो गए थे। एतगीन की हत्या के पश्चात बदरूद्दीन सुंकर रूमी ने नायब के अधिकार प्राप्त कर लिए। उसने बहराम की हत्या का षड्यंत्र रचा; परंतु स्वयं ही मारा गया।। इन हत्याओं से तुर्की अमीर भयभीत हो उठे।

उन लोगों ने सुल्तान को पदच्युत करने का षड्यंत्र रचा। 1241 ई. में लाहौर पर मंगोलों ने आक्रमण कर दिया। 13 मई, 1242 ई. को बहरामशाह की हत्या कर दी गयी।

अलाउद्दीन मसूदशाह (1242-46 ई.)

अलाउद्दीन मसूदशाह रूकुनुद्दीन फिरोज शाह का पुत्र व इल्तुतमिश का पौत्र था। मसूदशाह भी एक दुर्बल और अयोग्य व्यक्ति था। वह नाममात्र का शासक था। अब मलिक कुतुबुद्दीन हसन नायब और अबू बक्र वजीर बना। बलबन हो हास का अक्ता प्राप्त हुआ। शासन का वास्तविक सत्ता वजीर महाजबहीन के हाथों में थी जो एक ताजिकस्तान का गैर-तुर्क था। धीरे-धीरे बलबन ही सबसे प्रमुख व्यक्ति बन गया।

मसूदशाह के समय में पुन: मंगोलों का आक्रमण हुआ। 1245 ई. में मंगोलों ने उच्छ पर अधिकार कर लिया। बलबन ने अपनी सैनिक प्रतिभा के बल पर मंगोलों को मार भगाया एव उच्छ पर पुनः अधिकार किया।

बलबन के इस कार्य से जहां उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा बढ़ी, वहीं अमीरों में सुल्तान मसूदशाह के प्रति ईष्या की भावना भी पैदा हुई। बलबन ने षड्यंत कर मसूदशाह को गद्दी से 10 जून, 1246 ई. को हटाकर कैद कर लिया। कैदखाने में ही उसकी मृत्यु हो गई।

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नासिरूद्दीन महमूद (1246-66 ई.)

10 जून,1246 ई. में युवा नासिरूद्दीन महमूद शम्सी मलिकों द्वारा सुल्तान के पद पर प्रतिस्थापित किया गया।

उसने तुर्की अमीरों की शक्ति का अंदाज लगाकर सारी सत्ता चालीसा के सरगना और नायब बलबन के हाथों में सौंप दी। वह नाममात्र का शासक बनकर ही संतुष्ट हो गया। फलतः, तुर्की अमीरों और सुल्तान के बीच चलता आ रहा सत्ता का संघर्ष समाप्त हो गया।

बकुतुलुगखां जिसने नासिरूद्दीन महमूद की माता मलिका-ए-जहां से विवाह कर लिया और अवध का इक्ता प्राप्त कर स्वतंत्र शासक बना। 1266 ई. में नासिरूद्दीन की अचानक मृत्यु हो गयी। वह शस्सी वंश का अंतिम शासक था। इसका कोई पुत्र नहीं था इसलिए अगला शासक गियासुद्दीन बलबन बना जिसने बलवनी वंश की स्थापना की थी।

गियासुद्दीन बलबन (1266 ई.- 1286 ई.)

बलबन इत्बरी तुर्क जाति का था उसका जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था। दुर्भाग्यवश बलबन अपनी युवास्था में ही मंगोलों द्वारा बंदी बना लिया गया। मंगोलो ने उसे बसरा ले जाकर दास के रूप में ख्वाजा जलालुद्दीन के हाथों बेच दिया। ख्वाजा शिक्षा देकर 1223 ई. में दिल्ली लाया।

बलबन से प्रभावित होकर इल्तुतमिश ने 1233 ई. को उसे खरीद लिया दासो के दल(चालीसा) में शामिल कर लिया अगस्त 1249 ई. को बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नासिरूद्दीन से कर उसे उलूग खां की उपाधि प्रदान किया। इसका वास्तविक नाम बहाउद्दीन था और यह गियासहीन बलबन के नाम से पर बैठा। फिरदौसी के शाहनामा में वर्णित अफराशियाब के वंश से बताया गया

बलबन ने अपने विरोधियों की समाप्ति के लिए लौह व रक्त की नीति (खून का बदला खून) का अनुपालन किया। बलबन ने गद्दी पर बैठते ही चालीसा को नष्ट कर दिया। उसने इल्तुतमिश के परिवार के सभी सदस्यों को मरवा दिया था।

बलबन ने पारसी-नववर्ष की शुरूआत पर मनाये जाने वाले उत्सव ‘नौरोज’ की शुरूआत की थी। सुल्तान की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए दरबार में फारसी परंपरा ‘सिजदा’ (घुटनों के बल बैठकर सुल्तान के सामने सिर झुकाना) तथा ‘पाबोस’ (पेट के बल लेटकर सुल्तान के पैरों को चूमना) प्रथाएँ शुरू की थी।

बलबन ने वित्त विभाग (दीवान-ए-विजारत) को सैन्य विभाग से अलग कर नये सैन्य विभाग (दीवान-ए-आरिज) मंगोल आक्रमण से बचाव हेतु स्थापना व बलबन ने ही सर्वप्रथम सदैव तत्पर सेना रखने की प्रथा शुरू की थी। गुप्तचर अधिकारी को बरीद कहा जाता था। फारसी के प्रसिद्ध कवि अमीर खसरो व अमीर हसन दरबार में रहते थे।

कैकुबाद (1287-1290 ई.)

बलबन की इच्छा अपने ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त भी करने की थी, परंतु बलबन के जीवनकाल में ही वह मंगोलों से संघर्ष करता हुआ मारा गया। अतः, बलबन ने मुहम्मद के पुत्र कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी के नियुक्त किया; परंतु मृत शक्तिशाली सुल्तान की यह इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी।

सुल्तान के मरते ही उसके अमीर पुनः सक्रिय हो उठे। उन लोगों ने कैखुसरो को सुल्तान भेज दिया एवं उसकी जगह पर बुगरा खां के पुत्र कैकुबाद को सुल्तान मनोनीत किया।

कैकुबाद को सुल्तान बनाने में दिल्ली के कोतवाल मलिक फखरूद्दीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। उसी के प्रयासों से अल्पायु: कैकुबाद सुल्तान बन सका। सुल्तान को बहकाकर कैखुसरो की भी हत्या करवा दी।

इस समय बलबन का पुत्र बुगरा खां (सुल्तान का पिता) बंगाल पर नासिरूद्दीन के रूप में स्वतंत्र शासक के रूप में शासन कर रहा था।

क्यूमर्स (1290 ई.)

तुर्की अमीरो ने कैकुबाद के नाबालिक पुत्र क्यूमर्स को गद्दी पर बिठाया। जलालुद्दीन उसका संरक्षक नियुक्त हुआ। इस बीच कैकुबाद की भी हत्या कर यमुना नदी में फेक दिया गया। क्यूमर्स(शम्सुद्दीन) के साथ दिल्ली से बहारपुर चला गया। इससे तुर्की अमर आशंकित हो गए। उन लोगों ने क्यूमर्स के साथ जलालुद्दीन को दिल्ली आने का आदेश दिया।

दिल्ली की जनता भी नन्हें सुल्तान के अपहरण से जलालुद्दीन का विरोधी बन बैठी। यद्यपि जलालुद्दीन ने अनेक विरोधियों को मार डाला, तथापित जन-प्रतिरोध का ध्यान रखते हुए उसने क्यूमर्स को गद्दी पर सुल्तान के रूप में प्रतिष्ठित किया और स्वयं उसका संरक्षक बना रहा।

3 माह पश्चात कैमूर्स का बंदी बनाकर और उसकी हत्या कर स्वयं जलालुद्दीन सुल्तान बन बैठा। इस प्रकार इल्बारी तुर्को का शासन समाप्त हुआ में और खिलजी-वंश की सत्ता स्थापित हुई।

FAQ: गुलाम वंश (Gulam Vansh)

FAQ: गुलाम वंश

Q1: गुलाम वंश के शासकों का शासन काल कब तक रहा?

Ans. गुलाम वंश (Gulam Vansh) शासकों का शासन काल (1206 ई.-1290 ई.) तक रहा, गुलाम वंश (Gulam Vansh) नाम दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाले सुल्तान 3 अलग-अलग वंशों के कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुतबी, इल्तुतमिश ने शम्सी और बलबन ने बलबनी वंश की स्थापना की थी।

Q2: गुलाम वंश का अंतिम शासक कौन था?

Ans. गुलाम वंश (Gulam Vansh) का अंतिम शासक क्यूमर्स था।

Q3: गुलाम वंश के शासकों में लाख बख्श नाम से कौन जाना जाता था?

Ans. गुलाम वंश (Gulam Vansh) के शासकों में लाख बख्श नाम से कुतुबुद्दीन ऐबक को कहा जाता था गुलाम वंश (Gulam Vansh) में अपनी दानशीलता के कारण वह लाख बख्श (लाखों का दान करने वाला) व पील बख्श (हाथियों का दान देने वाला) के नाम से विख्यात था।

Q4: दिल्ली सल्तनत की पहली और अंतिम महिला मुस्लिम शासिका कौन थी?

Ans. रजिया दिल्ली की प्रथम व अन्तिम मुस्लिम महिला शासक थी।  

Q5: गुलाम वंश का अन्य दूसरा नाम क्या था?

Ans. गुलाम वंश (Gulam Vansh) को मामलुक वंश भी कहते थे।

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