Bahmani Samrajya (1347-1518) – बहमनी साम्राज्य का इतिहास



बहमनी साम्राज्य (Bahmani Samrajya) की स्थापना मुहम्मद तुगलक के काल में अलाउद्दीन हसन बहमनशाह (हसनगंगू) ने की थी। दिल्ली सल्तनत के विघटन के परिणामस्वरूप स्थापित हुए मुस्लिम राज्यों में यह सर्वाधिक शक्तिशाली था। इस साम्राज्य का विस्तार उत्तर में बरार से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक था। इस राज्य में 18 सुलतानों ने लगभग 180 वर्ष (1347-1527 ई.) तक शासन किए। कलीमुल्लाह बहमनी साम्राज्य का अंतिम शासक था। 3 अगस्त 1347 ई. को अबुल मुजफ्फर, अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (हसन गंगू) की उपाधि धारण कर गुलबर्गा की गद्दी पर बैठा।

बहमनी वंश (Bahmani Samrajya) का अन्त

1490 ई. में बीदर में बारीदशाही का प्रभाव स्थापित हो गया। सत्ता की पूरी शक्ति कासिम बारीद व उसके पुत्र अमीर अली बारीद (दक्कन का लोमड़ी) के हाथों में केंद्रित थी। 1518 ई. में शिहाबुद्दीन के मृत्यु के बाद उसके 4 पुत्र (1. अहमद, 2. अलाउद्दीन, 3. वलीउल्लाह, 4.कलीमुल्लाह) शासक बने। कलीमुल्लाह बहमनी वंश (Bahmani Samrajya) का अंतिम शासक था। उसने बाबर को अपनी सहायता के लिए बुलाया था, किन्तु बाबर ने कोई ध्यान नहीं दिया 1526 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी। इसके साथ ही बहमनी वंश का अंत हो गया।

बहमनी – विजयनगर संघर्ष

दक्षिण में तुगलक सत्ता के समाप्ति के बाद 14वीं शताब्दी के मध्य अर्थात् एक ही समय में विजयनगर बहमनी साम्राज्य (Bahmani Samrajya) दोनों अस्तित्व में आए। 14वीं शताब्दी के मध्य से लेकर 16वीं शताब्दी के मध्य तक दो शताब्दियों तक दोनों के मध्य प्रभुत्व के लिए संघर्ष चलता रहा। जिसका अन्त 1565 ई. में तालीकोटा के युद्ध के साथ हुआ।

विजयनगर व बहमनी साम्राज्य के मध्य संघर्ष का केन्द्र कृष्णा व तुंगभद्रा नदियों के मध्य स्थित प्रसिद्ध रायचूर दोआब था।

बहमनी साम्राज्य के उत्तरवर्ती 5 दक्कन सल्तनत राज्य

 राज्यस्थापनासंस्थापकराजवंशराजधानीविलय
1. बरार1484फतहउल्ला इमाद इमादशाही एलिचपुर, गाविलगढ़1574ई. को अहमदनगर में
2. बीजापुर1489यूसुफ आदिल खानआदिलशाहीनौरसपुरमुगल साम्राज्य में 1686ई. को औरंगजेब द्वारा
3. अहमदनगर 1490मलिक अहमदनिजामशाही जुन्नार, अहमदनगरमुगल साम्राज्य में 1633ई. को शाहजहां द्वारा
4. गोलकुंडा1512कुली कुतुबशाहकुतुबशाहीगोलकुंडामुगल साम्राज्य में 1687 ई. को औरंगजेब द्वारा
5. बीदर1526अमीर अली बरीदबरीदशाहीबीदर1618ई. को बीजापुर में

1. बरार

इमादशाही वंश

सर्वप्रथम बहमनी राज्य से अलग होने की घोषणा करने वाला क्षेत्र बरार था। उसकी 2 राजधानियां (1. एलिचपुर, 2. गाविलगढ़) थी। बरार में इमादशाही वंश का संस्थापक फतेह उल्लाह खा इमादुल्मुल्क था। यह मूलतः विजयनगर का एक ब्राह्मण था जो इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था।

महमूद गवां ने इसे गविलगढ़ का तरफदार (गवर्नर) नियुक्त किया था। 1504 ई. में फतेहउल्लाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन इमादशाही की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा ।

इमादशाह ने अपनी शक्ति के बल पर बरार को विस्तृत किया। इसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र दरया इमाद शाह शासक बना। तत्पश्चात् उसका पुत्र बुरहान इमादशाह 1562 ई. में गद्दी पर बैठा। इसी के शासन काल में उसके एक मंत्री तूफाल ने | उसे नरनौल के किले में कैद कर गद्दी पर अधिकार कर लिया था।

अन्त में अहमद नगर के शासक मुर्तजा निजामशाह ने बुरहान इमादशाह को कैद से मुक्त कराया तथा 1574 ई. में बरार को अहमदनगर में मिला मिला।

2. बीजापुर

आदिलशाही वंश

आदिलशाही सुलतान स्वयं को तुर्की ऑटोमन राजवंश के राजवंश के वंशज बताते थे। बीजापुर के आदिशाही राजवंश का संस्थापक यूसुफ आदिल खां था।

प्रारम्भ में उसे महमूद गवां का संरक्षण प्राप्त था। उसका विवाह एक मराठी। महिला बुबूफी खानम से हुआ था। 

वह धार्मिक रूप से सहिष्णु था परन्तु शिया धर्म को प्रमुखता दी थी। उसने कला व साहित्य को भी संरक्षण प्रदान किया। 1510 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी।

3. अहमदनगर 

निजामशाही वंश

अहमद नगर के निजामशाही राजवंश का संस्थापक अहमदशाह था। इसकी उपाधि निजामुल मुल्क थी। महमूद गवां को प्राणदण्ड देने के बाद उसे बहमनी । साम्राज्य का वजीर नियुक्त किया गया था। 

उसने 1490 ई. में अहमद नगर की स्थापना की तथा जुन्नर से अपनी राजधानी । स्थानान्तरित किया था।

4. गोलकुण्डा

कुतुबशाही वंश

गोलकुण्डा का मुस्लिम राज्य वारंगल के पुराने हिन्दू राज्य के खण्डहरों पर स्थापित हुआ था। यह बहमनी साम्राज्य के तिलंग (तेलंगाना) प्रान्त की राजधानी थी।

गोलकुण्डा साहित्यकारों का बौद्धिक क्रीड़ा स्थल था तथा हीरों का विश्व प्रसिद्ध बाजार था ।

मसुलीपट्टनमकुतुबशाही साम्राज्य का विश्व प्रसिद्ध बंदरगाह था। गोलकुण्डा के कुतुबशाही वंश का संस्थापक कुली कुतुब शाह था जो एक तुर्की दास था। बहमनी शासकों ने उसे तेलंगाना का सुबेदार नियुक्त किया था तथा कुत्बुलमुल्ककी उपाधि प्रदान की थी।

1543 ई. में उसके पुत्र जमशेद ने उसकी हत्या कर शासक बना। अपने पिता का हत्यारा होने के कारण उसका शासन अलोकप्रिय रहा। फलस्वरूप अमीरों ने उसे गद्दी से हटा कर इब्राहीम को सुल्तान घोषित किया।

5. बीदर

बारीदशाही वंश

बीदर में बारीदशाही साम्राज्य का संस्थापक अमीर अली बारीद था। इसे दक्कन का लोमड़ी कहा जाता है। 1527 ई. में अन्तिम बहमनी शासक कलीमुल्लाह के राजधानी को छोड़कर जाने के बाद स्वतंत्रता की। घोषणा की तथा बीदर में बारीदशाही वंश के नाम से स्वतंत्र राज्य का स्थापना हुई थी।

1542 ई. में अमीर बारीद की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अली बारीद शाह उसका उत्तराधिकारी हुआ। इसने कृष्णा-तुंगभद्रा के युद्ध में मित्र राज्यों की सेनाओं के बाम भाग का नेतृत्व कर विजयनगर को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

इसके मृत्यु के बाद बीदर की गद्दी पर शक्तिहीन शासक बैठे जिनकी निर्बलता का लाभ उठाकर बीजापुर के सुल्तान इब्राहीम आदिलशाह-II द्वितीय ने बीदर पर आक्रमण कर 1619 ई. में इसे बीजापुर में शामिल कर लिया।

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